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एक हिन्दी सेवक का सड़क पर संघर्ष

अनंत प्रसाद सिन्हा

डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह मेहनतकश, किसान- मजदूर, और गरीबों की आवाज बन चुके हैं। राजधानी पटना में सब्जी बेचने वाला हो या सुदूर गांव में श्रम कर रहा किसान, यही मेहनतकश तबका इनका मुख्य पाठक है। श्रम की संस्कृति पर निर्भर समाज के बीच इनकी विशिष्ट पहचान है। सभ्य व कुलीन संस्कारों से सुगर्वित साहित्यिक बिरादरी इन्हें लेखक नहीं मानती है। कुछ साहित्यकार तो इन्हें ‘सड़क छाप लेखक’ कहते हंै, जबकि डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह स्वयं को ‘अछूत लेखक’ मानते हैं।

जीवन का 60वां बसंत देख रहा यह लेखक पिछले 38 सालों से हिन्दी की अनवरत सेवा कर रहा है। पिछले 23 सालों से लालजी साहित्य प्रकाशन का संचालन कर रहे हैं। वे अपनी पुस्तकों के प्रकाशक हैं। शहर से लेकर गांव तक में जाकर पुस्तक-प्रदर्शनी का आयोजन कर पुस्तकें स्वयं बेचते हैं। पुस्तक प्रदर्शनी के दौरान पेंटिंग प्रतियोगिता का आयोजन करते हैं। इसके जरिये बच्चों के अंदर छुपे कलात्मक गुणों को विकसित करने हेतु उन्हें पुरस्कृत भी करते हैं। वे पर्यावरण सह पुस्तक-प्रदर्शनी का आयोजन करते हैं। पुस्तक खरीदने वाले पाठकों को निःशुल्क ही अत्यंत बेशकीमती पौधे बतौर उपहार देते हैं। पुस्तक लोकार्पण का तरीका भी इनका अत्यंत ही आकर्षक और अनूठा है। लोकार्पण समारोह को जन-उत्सव की तरह मनाते हैं। बाजे-गाजे के साथ मार्च निकालते हैं। छात्र-छात्राओं, शिक्षकों, बुद्धिजीवियों एवं अन्य नागरिकों का कारवां इनके लोकार्पण मार्च में भाग लेता है। इस दरम्यान वे पाठकों के बीच निःशुल्क किताबें भी वितरित करते हैं। अबतक इनकी 45 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
डाॅ. सिंह का जन्म 13 जनवरी, 1958 को बिहार के बक्सर जिला अंतर्गत सुदूरवर्ती ग्राम सोनवर्षा में हुआ था। साधारण जोतवाले किसान मोती चन्द सिंह के घर में पैदा हुए लालजी प्रसाद का बचपन माता-पिता के संग गुजरा। पांच भाइयों में वह सबसे बड़े हैं। शिक्षा से पहला परिचय परिवारिक पर्यावरण में हुआ। इनके पिता शिक्षा के प्रति काफी जागरूक थे। होश संभालते ही इनका दाखिला गांव में अवस्थित विद्यालय में करा दिया।
पहली कक्षा से मैट्रिक तक की शिक्षा सोनवर्षा ग्राम स्थित स्कूल में प्राप्त की। वे बताते हैं, “जब मैं दसवीं कक्षा का छात्र था, किताबों में लेखकों की प्रकाशित तस्वीरें देख-देखकर दिल में लेखक बनने की लालसा उत्पन्न हुई थी। 1974 में मैट्रिक पास किया और बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। स्नातक की पढ़ाई करते हुए कविताएं लिखनी शुरू की। कविताएं लिखकर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए भेजता था, कविताएं लौटा दी जाती थीं। इसके बावजूद मैं निराश नहीं हुआ और मैंने लेखन-कार्य जारी रखा। 1978 में पिताजी से पैसा लेकर ‘शांति और क्रांति’ नामक अपने प्रथम काव्य संग्रह का प्रकाशन स्वयं करवाया। महज दो रुपये मूल्य की इस पुस्तक की बिक्री नहीं हो पाई, अंततः मित्रों के बीच फ्री में बाँट दिया। 1980 में राजनीति विज्ञान के साथ स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त कर बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से पैतृक गांव सोनवर्षा लौट गया।“ बाद के दिनों में मगध विश्वविद्यालय, बोधगया से पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त किया।
गांव लौटे तो वहां की तस्वीर बदल चुकी थी। पूरा इलाका नक्सल आंदोलन की गिरफ्त में आकर नक्सलवाद का गढ़ बन चुका था। जीवन और जमीन के सवालों से टकराते हुए श्री सिंह 1981 में ‘कुर्सी खाली करअ’ नामक जनवादी काव्य संग्रह लेकर सामने आए। जनता के लिए लिखी गई इस पुस्तक को जनता के बीच बांट दिया। जनवादी सवालों को लेकर इनकी सक्रियता बढ़ने लगी थी। इसी वर्ष इनकी शादी राजधानी पटना की पढ़ी-लिखी नवयुवती रीता सिंह के साथ हुई। शादी के बाद परिजनों ने प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी हेतु पटना भेज दिया।
आए थे प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने, लेकिन रम गए कविता, कहानी लेखन में। हर वक्त अपना प्रिटिंग प्रेस स्थापित करने की योजना बनाते रहते, यह सपना पूरा न हो सका। पॉकेट खर्च के लिए घर से 250 रुपए माहवार मिलते थे। ससुराल का अपना मकान था। पॉकेट खर्च के पैसे से ही घर के छत पर बागवानी किया करते। इसी जद्दोजहद के बीच 1983 के अप्रैल माह में पहला कहानी संग्रह ‘कसक’ नाम से प्रकाशित हुआ। पुस्तक की कीमत दस रुपए रखी गई थी। बकौल डाॅ. लालजी ‘कसक’ कहानी संग्रह के प्रकाशन के लिए पत्नी रीता सिंह गहना बेचकर राशि उपलब्ध कराई थी। इसी वर्ष राजधानी पटना के मैनपुरा मुहल्ला में महंत हनुमान शरण वित्त रहित काॅलेज की स्थापना हुई। लालजी प्रसाद इस काॅलेज में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुए। शिक्षक बनते ही श्री प्रसाद बिहार इंटर शिक्षाकर्मी महासंघ से भी जुड़ गए। बकौल लालजी प्रसाद सिंह, महासंघ के अध्यक्ष मधु सिंह ने बिहार के कोने-कोने में कहानी संग्रह ‘कसक’ की प्रतियां भिजवा तो दी, लेकिन कीमत की वसूली नहीं हो सकी।

ऐसे भी होता है पुस्तक का लोकार्पण
डाॅ. सिंह कहते हैं, “काॅलेज से पारिश्रमिक नहीं मिलता था। वे काॅलेज के शिक्षकों के सहयोग से कागज खरीदकर स्वयं कॉपी निर्माण करवाते और ठेला लगाकर चैक-चैराहे पर बेचा करते थे। कॉपी के कवर पृष्ठ पर काॅलेज का नाम प्रिंट होता था। काॅलेज के प्रचार के साथ-साथ शिक्षकों को थोड़ी बहुत आमदनी भी हो जाती थी। अचानक एकदिन यह बात ख्याल में आया कि जब सड़क पर कॉपी बिक सकती है, तो पुस्तक क्यों नहीं ? इसके बाद से लालजी प्रसाद पटना के चैक-चैराहों पर कॉपी के साथ-साथ किताबें भी बेचने लगे। पुस्तकों की बिक्री बढ़ाने के लिए ‘पुस्तक खरीदो, नकद इनाम पाओ’ योजना की शुरुआत की। महज 10 रुपए की पुस्तक खरीदने पर दो रुपए से लेकर पचास रुपए तक का नगद इनाम देने की योजना बनाई। योजना सफल रही। पाठक इनाम पाने के उद्देश्य से किताबें खरीदते थे। इससे पुस्तकों की बिक्री बढ़ने लगी। इनका उद्देश्य था ‘नो प्रोफिट नो लॉस’ पर पाठकों तक पुस्तक को पहुंचाना।
दूसरी ओर सभ्य साहित्यिक समाज इनकी आलोचना में जुट गया। तमाम आलोचनाओं से बेपरवाह डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह अपनी राह चलते रहे। इसी बीच 1989 में बिमल नारायण आर्य इनके काॅलेज में प्रिंसिपल के पद पर नियुक्त हुए। श्री आर्य हिन्दी साहित्य के प्रति इनका समर्पण देख कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगे। काॅलेज के प्राचार्य का संबल प्राप्त होते ही सेंटर फॉर रीडरशिप डेवलपमेंट द्वारा आयोजित पटना पुस्तक मेला में उन्होंने पहली बार 1996 में स्टाॅल लगाया। इस मेले में मात्र दस कहानी संग्रह लेकर दिनभर स्टाॅल पर बैठते थे।
बिहार बंटवारे के बाद बिहार में पेड़ों की संख्या काफी कम होने पर सवाल उठने लगा था। इन्हें लगा कि हिन्दी के साथ पर्यावरण का संरक्षण भी आवश्यक है। योजनाबद्ध तरीके से पहले अपनी बागवानी को विकसित किया। पुस्तक-प्रदर्शनी में पुस्तक खरीदने वाले पाठकों के बीच एक किताब पर एक पौधा निःशुल्क वितरित करने का फैसला किया। अब जहां भी प्रदर्शनी लगाते हैं, पाठकों को एलोवेरा, सिन्दूर, लौंग, तुलसी, अडेनियम, शमी प्लांट, मनीप्लांट, रबर प्लांट, फुटबॉल, करोटन, सुदर्शन, लेमनग्रास, रजनीगंधा, मेंहदी, लीली, ओड़हुल, अशोक, बेल, जामुन, इलाहाबादी अमरूद, आम, सहित कई अन्य प्रकार के औषधीय पौधों को वितरित करते हैं। इस कार्य के लिए इन्हें बागवानी पर काफी मेहनत करनी पड़ती है।

पुस्तक प्रदर्शनी : एक किताब खरीदो, एक पौधा फ्री
इन्होंने पुस्तक-प्रदर्शनी का दायरा काफी बढ़ा लिया है। पटना से लेकर बिहार के सुदूरवर्ती गांवों तक में प्रदर्शनी लगाते हैं। पटना से सटे दानापुर, पुनपुन से लेकर आरा, बक्सर के सुदूरवर्ती गांव सोनवर्षा, महादेवगंज सहित अन्य जगहों पर पुस्तक प्रदर्शनी का आयोजन कर चुके हैं। गांव एवं छोटे शहरों में जब भी प्रदर्शनी लगाते हैं, तो 800 से 900 तक की संख्या में पुस्तकों की बिक्री होती है। गांवों में पुस्तक प्रदर्शनी के लिए बजाब्ते तैयारी करते हैं। तैयारी में उन्हें 15-20 दिन लगते हैं। जिस इलाके में पुस्तक प्रदर्शनी लगानी होती है, वहां बुद्धिजीवियों, शिक्षकों एवं अन्य नागरिकों से संपर्क स्थापित करते हैं। जब वे लोग समझ जाते हैं कि लेखक उनके बीच आ रहा है, तो वे अपने स्तर पर एक सप्ताह पहले से ही प्रचारित करते हैं। इस प्रकार आम नागरिकों की गोलबंदी होती है और निर्धारित तारीख को पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाई जाती है। इस अवसर पर स्कूली बच्चों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पेंटिंग प्रतियोगिता एवं क्विज का भी आयोजन किया जाता है। बाल कलाकारों की हौसला-अफजाई के लिए बच्चों को पुरस्कृत भी करते हैं। डाॅ. लालजी कहते हैं – “अब तो इस मुहिम से स्थानीय मुखिया, सरपंच और जिला परिषद सदस्य को भी जोड़ने लगा हूँ। ग्रामीण राजनीति से जुड़े नेता इस मुहिम में काफी सहयोग करते हैं। उनके सहयोग से बहुत बड़ी जन गोलबंदी होती है। जब पुस्तक प्रकाशित करता हूँ, तो सहयोग करने वालों के प्रति आभार भी व्यक्त करता हूँ।“
पुस्तक लोकार्पण समारोह मनाने का तरीका भी इनका अत्यंत ही नायाब है। अन्य प्रकाशकों व लेखकों की तरह बंद कमरे में कुछ लोगों को इक्ट्ठा कर, शुष्क भाषणबाजी और बड़ा लेखक होने का प्रमाण-पत्र लेने का काम नहीं करते हैं। लोकार्पण समारोह को जन उत्सव की तरह मनाते हैं। अप्रैल, 2012 को ‘प्लास्टिक का भालू’ नामक पुस्तक के लोकार्पण समारोह का आयोजन पटना से सटे दानापुर में बैलगाड़ी पर किया। लोकार्पण के बाद बैलगाड़ी, टमटम पर सवार होकर छात्र-छात्राएं, किसान, मजदूर, प्रोफेसर, हर वर्ग के पुस्तक प्रेमी एवं पाठक हाथ में तिरंगा झंडा लहराते हुए, बाजे-गाजे के साथ पटना के कारगिल चैक तक आये। उल्लेखनीय है कि दानापुर से पटना की दूरी लगभग 13 किलोमीटर है। इस अनोखे मार्च को देख लोग मंत्रमुग्ध थे। बकौल डाॅ. लालजी, रास्ते में इस काफिले पर नजर कुछ रूसी पर्यटकों की पड़ी। रूसी पर्यटक यह नजारा देख काफी अचंभित हुए। पर्यटक भी कुछ दूरी तक साथ हो चले और उन्होंने साथ में अपनी तस्वीर खिंचवाई। 25 जुलाई, 2014 को ‘उड़ान भरो औरत’ का लोकार्पण राजधानी पटना के कारगिल चैराहे पर किया गया। लोकार्पण समारोह में मौजूद छात्र-छात्राओं, शिक्षकों एवं अन्य लेखक-प्रेमियों ने कैंडल मार्च निकाला। इस मार्च में शामिल लोग शंख, डमरू, घड़ी-घंट, झाल, करताल, ढोल बजाते हुए जे.पी. गोलम्बर तक गए। वहीं श्री प्रसाद ने अपनी इकतालीसवीं पुस्तक ‘रंगीन राजनीति’ का लोकार्पण देश की राजधानी दिल्ली में धरना-प्रदर्शन, भूख हड़ताल, आदि के लिए प्रसिद्ध जंतर-मंतर पर 8 मई, 2015 को किया।

लेखक फणीश्वरनाथ रेणु डॉट कॉम के संपादक और मॉडरेटर हैं।

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