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ब्रिटिश शासनकाल में कृषि व्यवस्था

डाॅ. परषोतम कुमार

ब्रिटिश शासन स्थापित होने से पहले भारत पर अनेक शासकों ने शासन किया है। किन्तु इन सभी सभ्यताओं ने सामाजिक गठन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं डाला। मुगल सामंतवादी थे, लम्बे समय तक शासन करने के बाद भी उन्होंने भारतीय ग्राम समाज व्यवस्था में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं किया। उन्होंने इसी व्यवस्था को अपना आधार बनाया। भारतीय अर्थ-व्यवस्था के आधार में परिवर्तन नहीं किया, किन्तु ब्रिटिश शासकों ने इस व्यवस्था का आधार ही छिन्न-भिन्न कर दिया। ‘‘अंग्रेज पहले विजेता थे, जिनकी सभ्यता हिन्दुस्तानियों से ऊँची थी और इसलिए जिन तक हिन्दुस्तानी सभ्यता की पहुँच न थी। अंग्रेज़ों ने देशी बस्तियों को उजाड़ कर, देशी उद्योग-धन्धों का नाश करके और देशी समाज के प्रत्येक महान और गौरवपूर्ण तत्व को धूल में मिलाकर हिन्दुस्तानी सभ्यता को नष्ट कर दिया।’’1 ब्रिटिश शासक पूँजीवादी थे। इन्होंने अपने राष्ट्र में सामन्तशाही को समाप्त कर आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था स्थापित की थी। इसी पूँजीवादी व्यवस्था का प्रसार उन्होंने भारत में प्रारम्भ किया। यूरोप में सामंतशाही व्यवस्था को नष्ट कर पूँजीवाद का विकास हुआ, वहाँ ध्वंसात्मकता के साथ संरचनात्मक कार्य भी हुए, किन्तु भारत में ब्रिटिश शासकों ने केवल ध्वंसात्मक प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया। जिसके कारण नई शक्तियों का विकास नहीं हुआ।
कृषि भारतीय अर्थ-व्यवस्था की धुरी रही है। ब्रिटिश शासन में कृषि-प्रणाली में अनेक परिवर्तन किए गए। परिणामतः किसान अत्यन्त दरिद्र होता गया। अंग्रेज़ों ने भारत की भूमि-व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए। इसमें सबसे पहले मालगुज़ारी निर्धारण की प्रणाली और भूमि के स्वामित्व का पंजीकरण था। प्राचीन समय से ही साल भर के उत्पादन का एक हिस्सा राजा को दिये जाने का नियम था। जो गाँव द्वारा सामूहिक रूप से शासक को दिया जाता था। ये हिस्सा उत्पादन के साथ घटता-बढ़ता रहता था और फ़सल के रूप में दिया जाता था। ब्रिटिश शासन में मालगुज़ारी पैसे के आधार पर तय की गई। ये राशि ज़मीन के हिसाब से तय कर दी गई। फ़सल कम हो या ज़्यादा निश्चित राशि देनी ही पड़ती थी। इस प्रणाली के अनुसार, किसान सीधे राज्य का काश्तकार बन गया। सरकार ने इस व्यवस्था से भूमि पर पूर्ण अधिकार कर लिया। अब किसान को लगान न दिए जाने की स्थिति में ज़मीन से बेदखल किया जा सकता था। ‘‘किसान पहले ज़मीन के मालिक थे, अब उनकी मिल्कियत छीन ली गई और वे लगान देकर दूसरे की ज़मीन पर खेती करने वाले काश्तकार बन गए।’’2 ग्रामीण समुदाय को आर्थिक कार्यों तथा प्रशासनिक भूमिका से वंचित कर दिया गया। ज़मीन पहले सामूहिक मानी जाती थी, लेकिन अब वह व्यक्तिगत सम्पत्ति बना दी गई और इसे अलग-अलग हिस्सों में बाँट दिया गया।

ब्रिटिश काल से पूर्व सरकार सामूहिक रूप में ग्राम से ‘कर’ वसूल करती थी। यह नगदी या उपज के रूप में होता था। राज्य को दिए जाने वाले ‘कर’ में प्रत्येक परिवार का हिस्सा निर्धारित किया जाता था। यह विभाजन प्रत्येक कृषक परिवार के उत्पादन के अनुसार होता था। इससे कृषक पर अत्याधिक बोझ नहीं पड़ता था। संकट के समय में भी उसकी आर्थिक स्थिति अधिक खराब नहीं होती थी और लगान चुकाने के लिए उसे महाजन या साहूकार के आगे झुकना नहीं पड़ता था। लेकिन ब्रिटिश शासनकाल में कर व्यक्तिगत रूप से लेना आरम्भ कर दिया गया। अब उत्पादन पर ‘कर’ निश्चित नहीं था। सूखे, अकाल, अधिक वर्षा, बाढ़ से फ़सल की बरबादी आदि प्राकृतिक आपदा का भी ध्यान नहीं रखा जाने लगा। उत्पादन में परिवर्तन का अब ‘कर’ से कोई सम्बन्ध न रहा। राजस्व ‘मुद्रा’ के रूप में निश्चित था, इसलिए कृषक उन फसलों को उगाने के लिए विवश हुआ, जो बाज़ार में बेची जा सकें। इन परिस्थितियों में फ़सल को बाज़ार में बेचने के लिए कृषक को बाध्य होना पड़ा। अब ग्रामीण कृषि अधिकाधिक ग्रामीण जनता के भरणपोषण के लिए न होकर बल्कि राष्ट्रीय बाज़ार और आगे चलकर संसार के बाज़ार के लिए उत्पादन का साधन हो गई। अतः कृषि भरणपोषणात्मक अर्थ-व्यवस्था से बदलकर बाज़ार अर्थ-व्यवस्था में परिवर्तित हो गई। लगान रकम के रूप में निश्चित करने से किसान पर बोझ बढ़ने लगा। सूखा, वर्षा आदि से फ़सल नहीं होती थी, किन्तु लगान अदा करने के लिए कृषक ने महाजन या साहूकार से ऋण लेना शुरू कर दिया। यह प्रक्रिया एक बार शुरू होने पर कभी खत्म होने का नाम नहीं लेती थी, अतः कृषक ऋणग्रस्तता के चंगुल में निरन्तर फंसता चला गया।
ब्रिटिश शासन ने भारत में जमींदारी प्रथा की शुरूआत की। इंग्लैण्ड की जमींदारी प्रथा को थोड़ा परिष्कृत कर भारत में लागू कर दिया। सन् 1793 ई. में लार्ड-काॅर्नवालिस ने बंगाल, बिहार और उड़िसा में इस प्रथा को शुरू किया। इन प्रान्तों में पहले से जमींदार मौजूद थे और मालगुज़ारी वसूल करते थे। उन्हें मालगुज़ारी वसूलने के लिए शासकों ने कमीशन पर नियुक्त किया था। वारेन हेस्टिंग्स के समय कम्पनी ने बंगाल एवं बिहार में राजस्व वसूली के अधिकार की नीलामी प्रारम्भ की। कम्पनी को अत्याधिक राशि देने वाले को राजस्व वसूली का अधिकार मिलता था। इस प्रकार इजारेदारी व्यवस्था का आरम्भ हुआ। जब इजारेदार कम्पनी को निश्चित रकम अदा करने में सफल नहीं हुए तो; उन्होंने कृषकों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। इजारेदारी व्यवस्था की असफलता के कारण जमींदारी व्यवस्था का आरम्भ हुआ। ब्रिटिश सरकार ने ज़मींदारों को ज़मीन का मालिक बना दिया और स्थायी तौर पर एक रकम निश्चित कर दी, जो वे सरकार को अदा कर सकें। यह राशि किसानों की कुल मौजूदा भुगतान राशि में 10/11 की दर से जोड़ी गई और 11वें हिस्से को जमींदार द्वारा भुगतान करने के लिए छोड़ दिया गया। सरकार ने बंगाल मंे 30 लाख पौंड राशि निर्धारित की, जो ज़मींदार किसानों से लेकर सरकार को देंगे। पुराने राजाओं के लिए ज़मींदार जो रकम वसूल करते थे, यह उससे बहुत अधिक थी।
ज़मींदारों द्वारा सरकार को निश्चित रकम अदा करनी पड़ती थी, किन्तु उन पर कर वसूलने सम्बन्धी कोई नियम नहीं था। वह जितना चाहे किसानों से बटोर सकें। जमींदारों का लगान सरकार द्वारा बढ़ाया नहीं जाता था। किन्तु वे प्रति 12वें वर्ष लगान बढ़ाते थे। कृषक से ज़मींदारों द्वारा मनमाना कर वसूल किया जाने लगा। इससे किसान भूखे मरने लगे। उसे लगान अदायगी तथा जीवन निर्वाह के लिए सूदखोर ग्राम ‘साहूकार’ के पास जाना पड़ा। कुछ जमींदार कृषकों से रियायत करते थे। लगान के लिए उनके साथ कठोरता से पेश नहीं आते थे। वे मालगुज़ारी की राशि का बोझ नहीं उठा सके और सरकार द्वारा उनकी ज़मींदारी नीलाम कर दी जाती थी।
ज़मींदारी प्रथा के कारण एक ऐसा वर्ग उत्पन्न हुआ, जो ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठावान था। सन् 1799 ई. में ज़मींदारों को अधिकार मिल गया कि भू-राजस्व न देने की स्थिति में वे कृषकों को भूमि से बेदखल कर सकते थे। फसल न होने पर कृषक राजस्व अदा करने में असफल होते थे। ज़मींदार ऐसे कृषकों से भूमि छीन कर उन्हें भूमिहीन खेतिहर मज़दूर बना देते थे। वस्तुतः स्थाई बंदोबस्त द्वारा सरकार की अपेक्षा ज़मींदारों को अधिक लाभ हुआ। ज़मींदार के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने ऐसा वर्ग तैयार किया, जो सरकार का वफ़ादार था और जिसने ब्रिटिश शासन को मजबूत करने में सामाजिक आधार का काम किया। एक ऐसा वर्ग जो लूट का एक हिस्सा पाकर अपने निहित स्वार्थ को ब्रिटिश शासन के बने रहने के साथ जोड़ दे। सन् 1923 ई. में ‘बंगाल लैंड ओनर एसोसिएशन’ के अध्यक्ष द्वारा वाईसराय को दिए गए पत्र से स्पष्ट होता है ‘‘महामहिम इस बात का भरोसा कर सकते हैं कि जमींदार लोग सरकार का पूरा-पूरा समर्थन करेंगे और पूरी निष्ठा के साथ सरकार की सहायता करेंगे।’’3 भारत के 19 प्रतिशत ज़मीन पर स्थायी ज़मींदारी बन्दोबस्त, 60 प्रतिशत ज़मीन पर अस्थाई ज़मींदारी बन्दोबस्त और 51 प्रतिशत ज़मीन पर रैयतवारी बन्दोबस्त था।
ब्रिटिश शासन काल में किसान पूरी तरह बर्बाद होते गए। मालगुज़ारी तथा लगान के बोझ के कारण कृषक ऋणग्रस्त होता गया। समाज में एक शक्तिशाली महाजन अथवा साहूकार वर्ग पैदा हो गया। भारतीय समाज में साहूकार हमेशा रहे हैं, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य में साहूकार बहुत प्रतिष्ठित हो गये। पुराने समय में कोई भी कर्ज़दार व्यक्ति व्यक्तिगत ज़मानत पर ही पैसा ले सकता था। उस कानून के अनुसार, कर्ज़ देने वाला व्यक्ति कर्ज़ लेने वाले व्यक्ति की ज़मीन पर कब्जा नहीं कर सकता था। ब्रिटिश शासनकाल में सारी स्थिति बदल गई। ब्रिटिश कानून ने महाजन को कर्ज़दार की कुर्की करने तथा ज़मीन पर कब्ज़ा करने का अधिकार दे दिया। इसके लिए कानून और पुलिस की पूरी ताकत उसके पीछे लगा दी। सरकारी समर्थन एवं पक्षधरता के कारण सूदखोर महाजन पूँजीवादी शोषण की समूची व्यवस्था का केन्द्र बन गया। महाजन के बिना मालगुज़ारी जमा कर पाना भी मुश्किल था। वे किसानों को आवश्यक हल, बैल, बीज, ऋण आदि उपलब्ध करवाता था। अनाज की खरीद और बिक्री में भी महाजन का महत्वपूर्ण योगदान था। यदि किसान ज़मीन को गिरवी रखकर एक बार साहूकार से ऋण लेता था, तो यह प्रक्रिया इस प्रकार चलती थी कि वह किसान से खेत मज़दूर बन जाता था, फिर भी ऋण से उऋण न हो पाता था। महाजन गाँव का तानाशाह बनता जा रहा था। वह किसानों के उत्पादन से बहुत बड़े भाग को सूद के रूप में रख लेता था। महाजन के इस शोषण के पीछे ब्रिटिश राज की शक्ति काम कर रही थी और यह वर्ग भी सरकार के प्रति वफ़ादार था। शासन सुचारु रूप से चलाने के लिए सरकार को इस प्रकार के वर्गों की आवश्यकता थी। ‘‘ब्रिटिश शासकों ने पूरे सामंत, ज़मींदार वर्ग के साथ मित्रता और सहयोग का रास्ता अपनाया, उन्हें अपने शासन का आधार स्तंभ बनाना आरम्भ किया।’’4 इस प्रकार ब्रिटिश शासन में किसान मुख्य रूप से मालगुज़ारी, ज़मींदारों द्वारा लगाए गए लगान तथा महाजनों के सूद तीनों तरह के बोझ से बेहाल हो रहा था। वह प्रायः दरिद्र होता जा रहा था। तीनों के बोझ से भूमिहीन खेत मजदूरों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही थी और ज़मींदार तथा महाजन भूमि के मालिक बनते जा रहे थे। ब्रिटिश काल में भूमि विक्रय की वस्तु बन गई जो पहले नहीं होती थी।
भारतीय ग्राम व्यवस्था का निर्माण कृषि और उद्योग सम्बन्धी व्यवसाय की एकता पर आधारित था। सन् 1840 ई. में माटंगीमरी मर्टिन ने संसदीय जाँच समिति के समक्ष कहा, ‘‘मैं यह नहीं मानता कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत जितना कृषि प्रधान देश है, उतना उद्योग प्रधान भी है और जो उसे कृषि प्रधान देश की स्थिति तक लाना चाहते हैं, वे सभ्यता के पैमाने पर उसका स्थान नीचे लाने की कोशिश करते हैं।’’5 ‘करघा’ और ‘चरख़ा’ पुराने भारतीय समाज की धुरी थे। ब्रिटिश शासन ने इस व्यवस्था को तोड़ डाला। ब्रिटिश शासकों ने राज्य की शक्ति का प्रयोग कर पुराने उद्योग धन्धों को नष्ट कर दिया, किन्तु कृषि प्रधान स्वरूप को बनाए रखा, क्योंकि ब्रिटिश पूँजीवाद के उद्योगों के लिए अत्याधिक कच्चे माल की आवश्कता थी, जो भारत से सहज रूप में उपलब्ध हो सकता था। इसलिए इनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत का कृषि प्रधान देश बने रहना ज़रूरी था। यहीं से कच्चा माल अपने देश भेजकर और अपने उद्योगों का तैयार माल भारत के बाज़ार में लाकर देशी कुटीर उद्योगों को समाप्त कर दिया।
परिणामतः इन शिल्पकारों, कारीगरों को गाँव में शरण लेनी पड़ी। जिसके कारण कृषि पर अत्याधिक भार बढ़ता गया। सभी बुनकर, कुम्हार आदि कारीगरों के पास कृषि ही एकमात्र विकल्प रही। ‘‘बरबाद हुए शिल्पकारों की इस सेना ने पहले से ही कृषि पर निर्भर रहने वाले लोगों की संख्या को बढ़ाया और ग्रामीण जनता की निर्धनता को अधिक तीव्र बना दिया, जो उनकी भीषण ऋणग्रस्तता का प्रमुख कारण है।’’6
भारतीय किसान के सामने सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व की थी। मौजूदा साम्राज्यवादी नीतियों, ज़मींदारी प्रथा, भूमि व्यवस्था में परिवर्तन से उनकी समस्या का हल नहीं हो पा रहा था। किसान प्रायः ऋणग्रस्तता की मार सह रहे थे। इसके साथ ही बढ़ती कीमतें तथा अकाल की मार भी उस पर पड़ रही थी। खेतिहर सर्वहारा की संख्या में वृद्धि, ज़मींदारी प्रथा में ऐसे लोगों का बढ़ना जो खेती नहीं करते थे, खेती में निरन्तर आती गिरावट, जनसंख्या के कारण खेती में असंतुलन, जोतों का टुकड़ों में बँटना, किसान पर कर्ज़ का बोझ, सूदखोर द्वारा शोषण ये सब किसान में असंतोष तथा विद्रोह की चेतना को जगा रहे थे। ‘‘किसानों की ‘सामान्य और व्यक्तिगत सम्पत्ति’ की इस लूट का तत्कालीन फल था, अपने ऊपर लादे हुए टैक्स वसूल करने वाले ज़मींदारों के खिलाफ किसानों के विद्रोहों का तांता।’’7 यह असंतोष तथा विद्रोह की घटनाएँ धीरे-धीरे आन्दोलन का रूप ग्रहण कर लेती हैं। ज़मींदार तथा महाजन ब्रिटिश सरकार का साथ देते थे। उनके प्रति किसानों के विद्रोह के स्तर बढ़ते गए। किसान आन्दोलनों में 1855 ई. का ‘संथाल विद्रोह’ और 1875 ई. का ‘दक्कन विद्रोह’ बहुत महत्वपूर्ण थे। देश के अधिकांश हिस्सों में किसानों ने लगान बढ़ाने, जबरन गुलाम बनाने तथा ज़मीन के जबरन हस्तांतरण के खिलाफ आन्दोलन किए। आर्थिक संकट के दौर में भी किसानों का विद्रोह निरन्तर बढ़ता ही जा रहा था। सन् 1936 ई. में पहला अखिल भारतीय किसान संगठन बना। इसी समय ‘किसान सभा’ की पहली कांग्रेस का आयोजन भी किया गया। सन् 1928 ई. में अधिकांश स्थानों पर किसानों ने बड़े-बड़े संघर्ष किए। इसमें अधिक स्तरों पर सफलता भी मिली। समय-समय पर प्रदर्शनों का दौर भी चलता रहता था। सन् 1942-45 की अवधि किसान आन्दोलन के लिए महत्वपूर्ण रही है। सन् 1942 में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा राष्ट्रीय आन्दोलन के अनेक नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। उस समय किसान-सभा तथा उसकी प्रांतीय शाखाओं ने राष्ट्रीय नेताओं की रिहाई के लिए आन्दोलन चलाए थे। आन्ध्र प्रदेश में हजारों एकड़ बंजर ज़मीन को खेती के योग्य बनाया गया। अकाल के दिनों में किसानों ने गाँव-गाँव घूमकर अनाज इकट्ठा किया तथा अन्य खाद्य सामग्री उन इलाकों में भेजी, जहाँ गरीब किसान भूखे मर रहे थे। सरकार की बेदिली तथा ज़मींदारी शोषण ने किसानों को कई जुझारू कदम उठाने के लिए बाध्य किया।

संदर्भ :

  1. कार्ल माक्र्स, भारत सम्बन्धी लेख, पृ. 63
  2. रजनी पामदत्त, आज का भारत, पृ. 245
  3. वही, पृ. 249
  4. अयोध्या सिंह, भारत का मुक्ति संग्राम, पृ. 17
  5. रजनी पामदत्त, आज का भारत, पृ. 145
  6. ए. आर. देसाई, भारतीय ग्रामीण समाजशाास्त्र, पृ. 70
  7. रामविलास शर्मा, सन सत्तावन की राज्य क्रान्ति और माक्र्सवाद, पृ. 76

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