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अब भी हो रहा है बाल विवाह

राजीव मणि

‘‘लाली कुमारी (काल्पनिक) नाम है मेरा। मेरी उम्र अभी 18 साल है। बीए में पढ़ती हूं। जब मैं एक साल की थी, मेरी शादी कर दी गयी थी। मुझे कुछ भी नहीं पता था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। पटवा टोली में ही मेरा ससुराल है। अभी मायके में रहकर पढ़ाई कर रही हूं। मेरे साथ बहुत गलत हुआ है सर! मैं नहीं चाहती कि किसी और लड़की के साथ ऐसा हो। हर साल यहां कई शादियां होती हैं। छोटे-छोटे बच्चों की। चाहकर भी हमलोग कुछ बोल नहीं पाते हैं।’’ यह दर्द गया जिले के मानपुर स्थित पटवा टोली नामक बस्ती की एक लड़की का है। सिर्फ दुलारी ही नहीं, यहां ऐसी कई बच्चियां हैं। सभी शादीशुदा!
दरअसल कभी सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछड़ी यह जाति खुद को राजस्थान के बंजारों का वंशज बताती है। ये बंजारे कभी राजा मानसिंह के साथ राजस्थान से यहां आये थे। और तभी से ये यहीं के होकर रह गये। हैण्डलूम व पावरलूम का पेशा इनका वर्षों पुराना है। धागा का निर्माण करना, रंगना, कपड़े बुनना घर-घर में होता है। समय के साथ पटवा जाति के लोगों में भी काफी बदलाव आया। सामाजिक, आर्थिक रूप से ये काफी मजबूत होते गये। कभी शिक्षा का घोर अभाव दिखता था यहां। आज यहां कई स्रातकोत्तर व स्रातक हैं। इसी विरादरी के रितू राज प्रसाद बताते हैं कि इस बस्ती के करीब 360 लड़कें आज इंजीनियर बन अच्छी जगहों पर काम कर रहे हैं। करीब 620 लड़कें अभी इंजीनियरिंग कर रहे हैं। ज्ञात हो कि पिछले वर्ष पटवा टोली अखबारों की सुर्खियां बनी थी। सिर्फ इस कारण कि इंजीनियरिंग में यहां के कई लड़कों की रैंकिंग काफी अच्छी थी। विडम्बना यह है कि जिस समाज में इतनी जागरूकता आ गयी, वहां आज भी बाल विवाह धड़ल्ले से हो रहे हैं।
अगर रितू राज जी की बात मानें तो बाल विवाह पर पहले से काफी अंकुश लगा है। वे कहते हैं कि अब सिर्फ 20 फीसदी ही बाल विवाह हो रहे हैं। जब इसकी वजह पूछी गयी, तो उन्होंने कहा कि हमलोग फिजुल खर्च को ठीक नहीं मानते। दूसरी बात कि यहां हर किसी की शादी पटवा टोली के अंदर ही किसी लड़के के साथ करनी होती है। अगर कोई बाहर के पटवा से शादी कर भी ले तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। ऐसे में वर-वधु पक्ष दोनों पटवा टोली के ही निवासी होते हैं।
सफाई चाहे जो भी दी जा रही है, सच्चाई यह है कि इस बस्ती में बाल विवाह जारी है। छानबीन में पता चला कि आज भी यहां काफी शादियां कम उम्र में ही कर दी जा रही हैं। इसी क्रम में रानी कुमारी (17) और सोनी कुमारी (17) से (दोनों काल्पनिक नाम) भी मुलाकात हुई। रानी की शादी मात्र 14 साल में हो चुकी है और सोनी की करीब 13 साल में। दोनों लाली की दोस्त हैं। ये भी बताती हैं कि इस तरह की शादी पर रोक लगनी चाहिए।
पड़ताल करते-करते मध्य विद्यालय मानपुर, गया पहुंच गया। यहां स्कूल की कुछ शिक्षिकाएं मिलीं। उन्होंने भी इस बात को माना कि पटवा जाति की लड़कियों की शादी कम उम्र में ही हो जाती है। अपना नाम न छापे जाने की शर्त पर उन्होंने बताया कि संजली (काल्पनिक नाम) यहां छठी क्लास में पढ़ती थी। ग्यारह वर्ष में ही उसकी शादी हो गयी। अब वह स्कूल नहीं आती। उन्होंने बताया कि मधु और दीपा (दोनों काल्पनिक नाम) पाचवीं क्लास में पढ़ती हैं। वे लड़कियां बता रही थीं कि उनकी शादी ठीक हो गयी है। इसी साल शादी होगी। इसी तरह की बात मधु (काल्पनिक नाम) के साथ भी है। वह भी इसी स्कूल में पढ़ती है। चौदह साल की उम्र में शादी हो गयी। छठी की यह छात्रा ब्याह दी गयी।
शिक्षिकाएं बताती हैं कि पटवा जाति की कई लड़कियां अबतक शादी कर स्कूल छोड़ चुकी हैं। शिक्षिकाएं कहती हैं, जब बच्चे पाचवीं में ही पढ़ रहे होते हैं तो उनके अभिभावक आकर पूछते हैं कि बच्चा पढ़ने में कैसा है। जब अच्छा बताया जाता है तो उनकी पढ़ाई जारी रखी जाती है। और जब यह कहा जाता है कि पढ़ने में कमजोर है तो उनकी पढ़ाई बंद कर अपने काम में लगा दिया जाता है। स्कूल में कई बच्चे ऐसे आते हैं जिनके हाथ रंगों से रंगे होते हैं। दरअसल वे अपने घरों में रंगाई का काम करते हैं।
बहरहाल इस वर्ष जल्द ही लगन शुरू होने को है। कई बच्चियों की शादी ठीक हो चुकी है। इन्तजार है लगन आने का। पटवा टोली में फिर गूंजेगी शहनाई। मौज-मस्ती, खान-पान सब होगा। और इन सबके बीच मासूमों की सिसकियां दबकर रह जायेंगी। पटवा टोली से बाहर भी नहीं निकल पायेगी आवाज। यह पूरा समाज यूं ही चलता रहेगा। अंदर भी, बाहर भी। किसी को ना तो कुछ दिखेगा और ना सुनाई देगा। अगर कुछ दिखेगा तो यह कि कम उम्र लड़कियां अपनी मांग में सिंदूर लगाये बाजारों, स्कूलों, कॉलेजों में हैं। सुशासन बाबू को इसपर ध्यान देना चाहिए। आखिर इन मासूमों का दोष क्या है?

परिचय : एक नजर
जाति : पटवा निवास स्थान : पटवा टोली, मानपुर, गया
कुल घर : करीब 16 सौ
आबादी : करीब 15 हजार
साक्षरता : करीब 40 फीसदी
पेशा : हैण्डलूम व पावरलूम। धागा निर्माण, रंगाई व बुनाई। घर-घर में वस्त्र निर्माण।
वर्ग : अन्य पिछड़ा वर्ग

क्या है इतिहास
श्री दुर्गा जी पटवाय जाति सुधार समिति के दुर्गा भवन में पटवा जाति के बच्चों के लिए एक विद्यालय चलाया जाता है। विद्यालय का नाम है पाटेश्वरी इंग्लिश स्कूल। इस स्कूल के संचालक हैं रितू राज प्रसाद। श्री प्रसाद बताते हैं कि मुगल काल में अकबर के जमाने में राजा मानसिंह को बिहार, बंगाल एवं उड़ीसा का सूबेदार बनाया गया था। राजा मानसिंह अपने लाव-लश्कर के साथ यहां पहुंचे। उन्हीं के साथ राजस्थान से बंजारा जाति के कुछ लोग भी यहां आये थे। बंजारा लोग गया के मानपुर में ही बस गये। और तब से ही उनके वंशज यहां हैं। दरअसल हमलोग बंजारों के वंशज ही हैं। राजा मानसिंह के नाम पर ही इस स्थान का नाम मानपुर पड़ा। श्री प्रसाद बताते हैं कि आज भी यहां रानी पदमावती का मंदिर है। साथ ही राजा मानसिंह के महल के अवशेष भी यहां हैं। राजा मानसिंह ने इस इलाके में सात कुंआ खुदवाये थे। कुछ कुंआ तो समय के साथ भर गये, कुछ के अवशेष बचे हैं। साथ ही कई साक्ष्य अब भी यहां मिलते हैं।

और भी हैं मामले
बिहार में बाल विवाह का मामला कोई नया नहीं है। यहां आज भी कई जिलों में हर साल छोटे-छोटे बच्चे, बच्चियों की शादी कर दी जाती है। सिर्फ पटवा जाति ही नहीं, दलितों में भी बाल विवाह खूब होता है। महादलितों की बात करें तो इनमें सौ फीसदी बाल विवाह ही होता है। विडम्बना यह है कि अधिकांश बच्चों को तो यह भी पता नहीं होता कि उनके साथ क्या हो रहा है। कुछ ऐसी ही बच्चियों से बात की गई। मामला काफी गंभीर व चौकाने वाला है।
गया के मानपुर में ही एक बस्ती है नवादा अनुसूचित। यहां करीब 50 घर हैं। र्इंट भट्ठा, खेत व अन्य जगहों पर मजदूरी करते हैं यहां के लोग। यहां दो लड़कियां मिलीं। संयोग से दोनों का नाम है रानी (काल्पनिक नाम)। एक की शादी मात्र 11 वर्ष में हो गयी। दूसरी की शादी 15 वर्ष में। दोनों अपने मायके में अभी हैं। दो और लड़कियों से बात की गयी। एक का नाम है साजमणि (12), दूसरी का सबिता (14) (दोनों काल्पनिक नाम)। दोनों इसी गांव की हैं। खोजबीन में पता चला कि दोनों बच्चियों की शादी ठीक हो चुकी है। इसी वर्ष लगन में होने वाली है।
महादलितों की स्थिति और भी खराब है। मुसहरों में सौ फीसदी शादियां कम उम्र में ही हो जाती हैं। ना सिर्फ जिलों में, बल्कि राजधानी की मुसहर बस्तियों में भी। विडम्बना यह कि सुशासन की सरकार होते हुए भी इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। ना सत्ता पक्ष का, ना विपक्ष का। सारे नियम-कानून यहां यूं ही रह जाते हैं। कभी इसपर नेता की आवाज तक नहीं निकलती। गुड़िया जैसी बच्चियां यूं ही ब्याह दी जाती हैं, गुड़िया से खेलने की उम्र में।

फ्लैशबैक
निश्चित रूप से समय के साथ हमारा समाज बदला है। 70 के दशक तक गर्भ में ही शादियां तय हो जाती थीं। 80 के दशक में इस मामले में काफी जागरूकता आयी। लेकिन, छोटे-छोटे लड़कों को पकड़कर या यूं कहें कि अपहरण कर शादी कर देने का चलन 80 के दशक के अंत तक खूब होता रहा। बिहार के कई ऐसे जिले हैं, जहां इस तरह की शादियां धड़ल्ले से होती थीं। बच्चों को पकड़कर ले जाया जाता था। उन्हें विभिन्न तरह से डराया-धमकाया जाता था। जबरन शादी कर दी जाती थी। एक ही दिन में सारे रिवाज आनन-फानन में निभा दिये जाते थे। रात होते-होते शादी की सारी रस्में खत्म। सब गुपचुप और सुनियोजित तरीके से होता था। अब इस तरह की शादी काफी कम देखने को मिलती है।

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