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किसानों की दुर्दशा का यथार्थ चित्रण है ‘फाँस’

अभिषेक प्रताप सिंह

संजीव जी का 2015 में आया ‘फाँस’ उपन्यास विदर्भ के किसानों की दुर्दशा का यथार्थ चित्रण है। किसान आत्महत्या के ऊपर केंद्रित यह हिंदी साहित्य का पहला अनोखा उपन्यास है। इसमें किसान आत्महत्याओं का एक सिलसिला चलता रहता है। किसान का जीवन स्तर मुश्किलों में बंधकर इतना गिर चुका है कि उसके पास बैल खरीदने के पैसे तक नहीं है। व्यवस्था चक्र में वह खुद बैल बन गया है और बैल के साथ बंध कर हल जोत रहा है। उपन्यास के प्रारंभ में ही विदर्भ के किसानों की हकीकत स्पष्ट हो जाती है। उपन्यास की पात्र शकुन कहती है 1, किसी के जुए में एक बैल एक भैंसा होता है। एक आध के जुए में इंसान भी।’ विदर्भ के किसानों का यह दृश्य बहुत ही दर्दनाक और असंवेदनशील है। परंतु क्या करें, वह ऐसी दुर्दशा में फँसा है कि उसके पास न बैल है और न ही आधुनिक उपकरण। व्यवस्था के जुए में बंध कर सरकार, पूंजीपतियों और अमीरों के लिए फसल उगाने को बाध्य हो रहा है। उसके द्वारा उपजाई गई फसल से भी उसका अधिकार छीन लिया गया है। वह चारों ओर से खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। आसपास रोज की आत्महत्याओं और अपनी आर्थिक बेहाली को देख कर वह कभी-कभी सोचने लगता है कि ‘मरना एक मुक्ति है और जीना एक बंधन’। धीरे-धीरे उसका दिमाग आत्महत्या की ओर खींचता चला जाता है।
जो किसान दिन-रात मेहनत करके दूसरों का पेट भरता है, वह खुद के लिए या अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने में नाकाम हो जाता है। समाज और सरकार ने उसे व्यवस्था की चक्की में इस कदर पिसा हुआ है कि वह सर उठा कर जी नहीं पा रहा और आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाता है। इन विषयों के ऊपर लोगों का ध्यान न जाना या चुपचाप बैठे रहना निश्चित ही एक संवेदनहीन और विवेकहीन समाज के रूप को दर्शाता है। एक सर्वे के मुताबिक, भारत में रोज 5-6 किसान आत्महत्या करते हैं। आत्महत्या जैसी चीजें आम हो जाए और जनता तथा देश का ध्यान ही उधर न जाए तो यह राष्ट्रीय शोक की बात है। बुद्धिजीवी वर्ग भी किस कदर इस विषय में चुप हैं और सत्ता से साँठ-गाँठ कर बैठा हुआ है।
भारत के हर कोने में किसानों की स्थिति लगभग एक जैसी ही है। अभी एक-दो साल पहले मध्यप्रदेश के एक दृश्य ने सब को विचलित करके रख दिया था। जहाँ दो बहनें बैल की जगह खुद जुए में बंध कर हल जोत रही थी। 21वीं सदी में ऐसा चित्र देश की सारी विकासवादी व्यवस्था को एक ही पल में धराशायी कर के रख देता है। इस उपन्यास में एक किसान नेता आंकड़ों का चिट्ठा रखते हुए कहता है, ‘‘नकदी फसल पूंजीवाद, साम्राज्यवादी शक्तियों का फैलाया लोभ का जहर है। कपास सबसे बड़ी नकदी फसल है। सो देश में सुनामी, गुजरात के दंगे, उत्तरांचल की 2013 के तांडव, सबको जोड़ दें, जितने मरे उससे भी ज्यादा अकेली 2012 तक 2,84,649 जिसमें 68 परसेंट कपास की खेती में।’’ 2
चारों ओर से असफल होने के बाद, धोखा खाने के बाद, नकद पैसा पाने के लोभ में किसान उद्योगपति के अनुसार खेती कर रहा है। अपने पारंपरिक खेती को छोड़कर नगदी के लालच में अपनी जान गंवा रहा है। उसकी फसलों का वाजिब मूल्य उसे नहीं मिल पा रहा है। मुनाफा तो दूर, उसकी लागत मूल्य का चंद प्रतिशत भी उसे नहीं मिल पाता है। सरकार दाम बढ़ाती भी है धान, गेहूं, बाजरे का तो कितना ? डेढ़-दो सौ प्रति क्विंटल। इतना परिश्रम, जान जोखिम में डालकर महीनों के इंतजार के बाद भी अगर उसे अपनी फसल का सही मूल्य नहीं मिलता है तो वह हताश होकर आत्महत्या की राह को चुन लेता है। दरअसल वह चुनता नहीं है, उसे आत्महत्या करने के लिए व्यवस्था बाध्य करती है। उसे लगता है, तड़प-तड़प कर पल-पल मरने से अच्छा है एक ही बार मर लिया जाए और वह जीवन त्याग देता है। सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं जाता, वह इन बातों को जान-बूझकर अनदेखा कर देती है। किसान सभा में इसके ऊपर चर्चा चल रही थी ‘‘आपने तेलंगाना का हाल सुना ? नए मुख्यमंत्री को कृषक आत्महत्याओं की कोई चिंता नहीं, जबकि एम.एल.ए. की तनख्वाह 95,000 से बढ़ाकर दो लाख करने जा रहे हैं। किसान तो हर तरफ से ठगे गए।’’ 3
जब तक किसान संसद में नहीं पहुँचेगा, खुद नीति नियंता नहीं बनेगा, तब तक राजनेता उसे इस तरह सताते रहेंगे और उसके साथ इस तरह का भेद-भाव होता रहेगा। केवल झूठे वादे और आश्वासन मिलते रहेंगे। किसी प्रकार की कोई सरकारी सुविधाएँ नहीं मिलेंगी। ऊपर से लूट का कारोबार सरकार के आश्रय से चलता रहेगा। किसान आत्महत्या के ऊपर अपना मंतव्य देते हुए विट्ठलदास कहते हैं, ‘‘आप उन्हें लाख आत्महत्या कहकर बरी हो लें, वह है हत्याएँ ही…।’’ 4
किसान को आत्महत्या करने के लिए व्यवस्था मजबूर करती है। नहीं तो कुछ हजार रुपए के लिए हजार-हजार किसान हर साल आत्महत्या नहीं करते। किसान की यह विडम्बना है कि कुछ हजार रुपये के लिए वह अपनी जान गंवा देता है और इसी देश में कुछ ऐसे लोग हैं, जो देश के अरबों-खरबों रुपए हड़प कर विदेश भाग जाते हैं और सरकार मूकदर्शक बनकर तमाशा देखती रहती है। उसकी भरपाई आमजन से की जा रही है। एक तरह से सरकार उन लोगों के साथ खड़ी है। किसान आत्महत्याओं के संदर्भ में रामविलास शर्मा चिंतित होकर लिखते हैं कि –

‘‘बरस रहा है जब वन में खेतों में जीवन
किसने किया इन्हीं खेतों में प्राण विसर्जन
किस की मिट्टी पर यह खेतों की हरियाली
किसके लाल लहू में फागुन की यह लाली।’’ 5

आज पूरे विश्व में एक धर्म युद्ध चल रहा है। अपने धर्म का दबदबा कायम रखने के लिए वे किसी भी हद तक जा रहे हैं। सभी अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने के लिए लगे हुए हैं। इस उपन्यास का एक आदिवासी पात्र इस धार्मिक जड़ता को ही उखाड़ते हुए कहता है, “हम न हिंदू है, न मुसलमान, न क्रीश्चियन, न बौद्ध बस ‘कोया’ हैं। क्या आदमी के लिए आदमी बना रहना काफी नहीं।” 6
अगर मनुष्य खुद को धर्म जाति के बंधन से मुक्त कर के स्वयं को केवल इंसान ही समझने लग जाए, तो देश की आधी समस्याओं का अंत ऐसे ही हो जाएगा।
गाय और जमीन किसानों का सबसे बड़ा धन है। इसी गाय को पाने के चक्कर में जिस प्रकार ‘गोदान’ उपन्यास का होरी दम तोड़ देता है, उसी प्रकार इस उपन्यास में मोहन दादा का यही हाल होता है। वह भुखमरी के कारण अपना बैल और जमीन बेच देते हैं। बैल कसाई को बेचने के बाद मोहन दादा हमेशा दुखी रहने लगते हैं और गोहत्या समझकर उसका प्रायश्चित करना चाहते हैं। गाँव के लोग उन्हें गोहत्यारा कहने लग जाते हैं। इसी परिस्थिति से परेशान होकर पत्नी सिंधुताई प्रायश्चित करने के लिए पति को साथ में लेकर काशी के एक बाबा के पास जाती है। ब्राह्मण हत्या और गोहत्या को हिंदू धर्म में ब्रह्म हत्या ही माना गया है। हाँलाकि सभी समस्याओं का समाधान पंडित के पास रहता है। सिंधुताई जमीन-बैल बेचकर वह सौ रुपये स्वामी निरंजन देव को देती है। ‘गोदान’ उपन्यास में धनिया का गोदान के रूप में पुरोहित को बीस आना देना और इस उपन्यास में सिंधुताई का गोहत्या के प्रायश्चित के लिए पंडित को सौ रुपये देना, यह साबित करता है कि किसानों की स्थिति 1936 में जैसी थी, आज भी कमोवेश वैसी ही है। धर्म आज भी उसके शोषण का बहुत बड़ा जरिया है। निरंजन देव मोहन दादा को प्रायश्चित का एक गजब तरीका बताते हैं – “बैल के गले का फंदा गले में डालकर एक भिक्षा पात्र लेकर भीख मांगनी पड़ेगी। शुद्धि तक न घर में घुस सकते हैं, न मनुष्य की बोली बोल सकते हैं। बैल की बोली… बाँ। या फिर संकेत ! समझे ? इस पोला से अगले पोला तक। फिर मैं आकर प्रायश्चित और शुद्धि के लिए विधान करूंगा।” 7
सालों साल बित गए, लेकिन मोहन दादा फिर कभी नहीं बोले और वापस घर लौटकर कभी नहीं आए। धार्मिक अंधविश्वास ने एक बोलते-चलते इंसान को गूंगा-अपाहिज बना दिया या फिर मार दिया। गाय पंडितों के लिए, अमीरों के लिए केवल एक आर्थिक आधार है एवं नेता के लिए राजनीतिक हथियार। कभी गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित कर देते हैं, तो कभी ‘राष्ट्र-पशु’। आज सत्ता को इंसान से ज्यादा फिक्र गाय की हो रही है, क्योंकि वर्तमान समय में गाय दूध के लिए नहीं, वोट बैंक के लिए इस्तेमाल हो रही है। पंडित, नेता तथा अमीर लोग घर में गाय नहीं पालते हैं, वे गाय का धंधा करते हैं। यही कारण है गाय को इतना मान-सम्मान देने वाला देश गोमांस एक्सपोर्ट करने में विश्व में दूसरे नंबर पर है। इससे समझ सकते हैं कि देश में गाय का क्या स्थान है ?
इन्हीं सब धार्मिक शोषण, धार्मिक राजनीति को देखते हुए आज का युवा वर्ग हिंदू धर्म को छोड़कर बौद्ध धर्म को अपना रहा है और इस शोषणवादी व्यवस्था के दलदल से मुक्त होना चाहता है। इसे उपन्यास में संजीव ने बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है। बनगाँव के किसानों को जब चारों ओर से निराशा हताशा हाथ लगी, तो उनका एकमात्र सहारा जंगल बचा था। जंगल के ऊपर भी जब सरकार कब्जा कर ली, तो सभी लोग असहाय हो जाते हैं। इस परिस्थिति में एक पात्र कहता है, “किस्मत में आये दिन बेइज्जत होना लिखा है, तो क्या करें लोग। किस देवी-देवता की पूजा नहीं की, मन्नत नहीं मांगी, लेकिन कुछ बदला ? कुच्छ नहीं ! उसे दिन ब दिन इन देवी-देवताओं पर संशय होता जा रहा था। …पिछली बार सत्तावन लोगों ने नागपुर की दीक्षाभूमि जाकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। इस बार बाकी लोग लेंगे।” 8
शकुन घर का कचरा साफ कर रही थी। उसमें देवी-देवताओं का भी फोटो था, जिसको बाहर फेंक रही थी। उसी समय पति के रोकने पर शकुन कहती है, “रूको, अब ये कचरे घर में नहीं लाएंगे। तेरे ये देवता और तुम क्या कर रहे थे जब पुलिस हमसे जानवर से भी बदतर सलूक कर रही थी।” 9
धीरे-धीरे लोगों में एक मानसिक चेतना जग रही है। परिवर्तन आ रहा है। उन्हें लगने लगा है कि उनके शोषण के लिए हिन्दू धर्म जिम्मेदार है। समाज का निम्न वर्ग, दलित, किसान, मजदूर, हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म को अपना रहा है। जनकवि रमाशंकर विद्रोही ने धर्म के इस शोषणवादी व्यवस्था को देखते हुए ईश्वर के विरुद्ध घोषणा की है। विद्रोही की ‘नयी खेती’ शीर्षक कविता में किसान ईश्वर का प्रतिरोध करते हुए कहता है कि भगवान है नहीं, उसे उगाया गया है –

“मैं किसान हूँ
आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले ! आसमान में धान नहीं जमा करता
मैं कहता हूँ पगले !
अगर जमीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक हो कर रहेगा
या तो जमीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा”

संदर्भ सूचि :

  1. संजीव – फाँस – पृ. 10
  2. संजीव – फाँस – पृ. 190
  3. संजीव – फाँस – पृ. 247
  4. संजीव – फाँस – पृ. 249
  5. इस्पातिका, किसान विशेषांक, जुलाई-दिसंबर 2013, संपादकीय
  6. संजीव – फाँस – पृ. 235
  7. संजीव – फाँस – पृ. 26
  8. संजीव – फाँस – पृ. 26
  9. संजीव – फाँस – पृ. 27
  10. स्रोत – kavitakosh.org

पता ः हिंदी विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद, तेलंगाना

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