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अदम गोंडवी की गजलों में ग्रामीण यथार्थ

डाॅ. परषोतम कुमार

ग़ज़ल उर्दू की लोकप्रिय साहित्यिक विधा है। इसकी शुरुआत स्त्री के रूप सौंदर्य या प्रेमालाप से हुई है। अतः इसे रोमानियत की विधा माना जाता है। ग़ज़ल का आरम्भ अरबी साहित्य से हुआ। इसके पश्चात फारसी, उर्दू और हिंदी साहित्य में भी यह बेहद लोकप्रिय हुई। उर्दू में ग़ज़ल इतनी प्रसिद्ध हुई कि इसे उर्दू का पर्याय माना जाने लगा। हिंदी में ग़ज़ल कहने की परंपरा बहुत पुरानी है। अमीर खुसरो ने अपनी कतिपय रचनाओं के माध्यम से हिंदी में ग़ज़ल की संभावनाओं का सूत्रपात किया। इसके पश्चात कबीर, शोकी, भारतेंदु, प्रताप नारायण मिश्र, प्रेमघन आदि ने इसे विकसित किया। द्विवेदी युग के बाद बहुत से लेखकों द्वारा ग़ज़ल का एक मंजा हुआ रूप सामने आया। जयशंकर प्रसाद, निराला, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह आदि ने ग़ज़लें लिखीं। आरंभिक दौर में कथ्य के आधार पर हिंदी गजल का स्वरूप उर्दू ग़ज़ल जैसा ही रहा। हिंदी ग़ज़ल को दुष्यंत ने पहली बार जन सरोकारों से जोड़ा। रोमानियत को विस्थापित कर जीवन के सवालों से संबद्ध किया।

यह सारा जिस्म झुक कर दोहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा।1

दुष्यंत की ग़ज़लों में आम आदमी की पीड़ा, निराशा, संशय, दुख, सपनों का टूटना तथा परिस्थितियों से संघर्ष निहित है। इससे भी आगे बढ़कर ग़ज़ल को खेत-खलिहान, किसान तथा गांव के मेहनतकश तबके के साथ जोड़ने का काम अदम गोंडवी ने किया। ग़ज़ल की परंपरा में दुष्यंत की गजलें एक मोड़ मानी जाती है, तो अदम की ग़ज़लें दूसरा मोड़ अख्तियार करती हंै, जिसमें एक साथ वह स्थानीयता से लेकर बाजारवाद और भूमंडलीकरण तक से जीरहा करती हैं। अदम गोंडवी का जन्म 22 अक्टूबर, 1947 में उत्तर प्रदेश गोंडा के आटा (परसपुर) गांव में हुआ। इनका वास्तविक नाम रामनाथ सिंह है। बिना किसी औपचारिक शिक्षा के रामनाथ सिंह का अदम गोंडवी बनना साहित्य के लिए विस्मयकारी घटना है।
आजादी के बाद के भारत का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवेश इनकी रचनाओं में प्रतिबिंबित होता है। अदम ने अपनी ग़ज़लों को आम आदमी के दुख-दर्द से जोड़ा। ग़ज़ल की परंपरा और उसके कथ्य में बदलाव का आह्वान करते हुए अदम कहते हैं –

भूख के एहसास को शेरो – सुखन तक ले चलो
या अदब को मुफलिसोें की अंजुमन तक ले चलो।
जो ग़ज़ल माशूक के जलवों से वाकिफ हो चुकी
अब उसे बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो। 2

अदम अपनी शायरी के साथ सीधे जनता की अदालत में खड़े होते हैं। वह जनता से जनता की भाषा में संवाद करते हैं। अदम की ग़ज़ल को ग़ज़ल के पैमानों पर कसने पर भले ही समीक्षक कोई दोष निकालें, लेकिन उनकी प्रतिबद्धता कथ्य और कहनगोई अपने आप में बेमिसाल है। वह ग़ज़ल को कठोर छंद शास्त्र और काव्यशास्त्र से बाहर निकाल कर गांव की चैपाल तक लेने की बात करते हैं ।

ग़ज़ल को ले चलो अब गांव के दिलकश नजारों में
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में। 3

गांव की चैपालें भूखे नंगे लोगों से भरी हुई हैं। अभावग्रस्त जीवन ग्रामीण समाज की नियति बन चुका है। भारतीय ग्राम आरंभ से ही आत्मनिर्भर रहे हैं। गांव की सभी आवश्यकताएं गांव में ही पूरी हो जाती थीं। ब्रिटिश शासनकाल में राज्य सरकार ने भूमि संबंधों में मनमाने बदलाव किए। गांव के कुटीर उद्योगों को समाप्त किया गया। भूमि संबंधों में बदलाव तथा लघु उद्योगों के खत्म होने से गांव की आत्मनिर्भरता समाप्त होती गई। धीरे-धीरे गांव शहरों पर निर्भर होते गए। निर्धनता गांव की नियति बन गई। अपने गांव का परिचय देते हुए अदम गोंडवी कहते हैं –

फटे कपड़ों में तन ढांके गुजरता हो जहां कोई
समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है। 4

किसान ग्रामीण जीवन की धूरी है। भारत की अधिकांश जनसंख्या गांव में रहती है। भारत की अर्थव्यवस्था कृषि, लघु उद्योग और पशुपालन पर निर्भर रही है। गांव की जीविका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर आधारित है। अंग्रेजों ने भारतीय पारंपरिक कृषि व्यवस्था में कुछ परिवर्तन किए। पहले भूमि सार्वजनिक संपत्ति होती थी, किंतु इसे व्यक्तिगत संपत्ति में बदल दिया गया। कोई भी भूमि का क्रय विक्रय कर सकता था। सामूहिक कर व्यवस्था को भी बदल कर व्यक्तिगत किया गया। ’कर’ के रूप में मुद्रा का चलन हो गया। अंग्रेजी शासनकाल में जमीनदारी व्यवस्था लागू की गई। सरकार और किसान के मध्य एक मध्यस्थ जमींदार आ गया जो किसानों का मनमाना शोषण करने लगा। साहूकार या महाजन को मनमाने अधिकार दिए गए। पैसा ना चुकाने पर वह किसान की कुर्की करवा सकते हैं। अतः अंग्रेजी शासनकाल में किसान की स्थिति बहुत ही दयनीय हो गई।
स्वतंत्रता के पश्चात जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया। जमींदारी उन्मूलन से अत्यधिक लाभ संभावित था, किंतु यह ठोस आर्थिक ना होकर गांव में सामाजिक और मानसिक लाभ के रूप में सामने आया। सरकार ने फालतू पड़ी जमीन, भूदान आंदोलन में मिली जमीन तथा जमींदारों से प्राप्त जमीन को भूमिहीनों में बांटने का कार्य तेज कर दिया। चकबंदी का कार्य भी तेजी से होने लगा। इसमें विभिन्न भू-स्वामियों के खेतों को एक जगह इकट्ठा किया जाता था। किंतु चकबंदी में भी नौकरशाही द्वारा प्रबल भ्रष्टाचार किया गया, रुतबेदार लोगों की मनमानी चलती रही। ऐसे लोगों ने अधिकांश उपजाऊ खेत अपने में मिला लिए तथा गरीब किसानों को इसमें भी नुकसान हुआ।

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गए
हमको पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में। 5

आजादी के बाद भी ब्रिटिशकालीन भ्रष्ट नौकरशाही के चलते ग्रामीण जीवन की हीनता दूर नहीं हुई। पंचवर्षीय योजनाएं स्वातंत्रर्योत्तर भारतीय विकास की नियामक थीं। सन 1950 में गठित योजना आयोग देश की आवश्यकताओं और संसाधनों को ध्यान में रखते हुए भारत के विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं बनाता रहा। किंतु जनसाधारण इन योजनाओं के प्रति उदासीन ही रहा। ग्रामीण समाज और कृषि इन योजनाओं में उपेक्षित रहे। पहली और छठी योजना के अतिरिक्त शायद ही कोई योजना अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकी हो। कृषि क्षेत्र की उपेक्षा के कारण गांव में गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी निरंतर बढ़ती गई। योजनाएं केवल कागजों में सिमट कर रह र्गइं। अदम की अधिकांश ग़ज़लों में इसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में
गांव तक वो रोशनी आएगी कितने साल में। 6

भूख, बेरोजगारी, संप्रदायिकता, गोदान के होरी का नित नया शोषण तथा आजादी के बाद किसान जीवन की समस्याएं इनकी शायरी की बुनियाद हैं। ग्राम समाज सरकारी व्यवस्था के हाथों छला गया है। संपूर्ण शायरी में अदम व्यवस्था से भिड़ते दिखाई देते हैं।
हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श जैसे आंदोलन आने से बहुत पहले अदम ‘चमारों की गली’ जैसी रचना लिखकर सवर्णों द्वारा उपेक्षित दलित समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखा चुके थे। भारतीय हिंदू समाज वर्णों में विभाजित है। जिसमें ब्राह्मण सबसे ऊंचे पायदान पर हैं और शूद्र सबसे नीचे। शूद्रों को हमेशा शोषण का सामना करना पड़ा है। इन शूद्रों में भी अतिशूद्र है ’दलित समाज‘। विडंबना की बात यह है कि दलित चारों वर्णों में नहीं आते। इन्हें अछूत, अंत्यज, पंचम वर्ण आदि कहा जाता था। इन्हें अस्पृश्य माना गया है, जिनके छूने भर से सवर्ण समाज भ्रष्ट हो जाता है। दलितों को सदियों से ही अधिकारों से वंचित रखा गया। इन्हें जानवरों से भी बदतर जीवन जीना पड़ा। जानवरों को छूने से सवर्ण समाज भ्रष्ट नहीं होता, किंतु दलितों की छाया मात्र ही उन्हें भ्रष्ट कर सकती थी। आर्थिक अभाव में पिस रहे इन दलितों की स्त्रियों को सवर्ण की भोग लिप्सा का शिकार बनना पड़ता था। सवर्णों द्वारा दलितों को अस्पृश्य माना जाता था, किंतु दलित स्त्रियों की इज्जत लूटने में इन्हें तनिक भी छूत नहीं लगती थी और ना ही इनका धर्म भ्रष्ट होता था। अपने गांव में ठाकुरों के द्वारा एक दलित लड़की के साथ किए गए बलात्कार की घटना को आधार बनाकर लिखी गई बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना है ’चमारों की गली’ –

आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊबकर
मर गई फुलिया बिचारी कल कुएं में डूब कर। 7

आलोच्य नज़म में लेखक ने सवर्णों द्वारा दलितों के शोषण को व्यक्त करते हुए संगठित दलितों द्वारा प्रतिरोध भी दिखाया है। स्वयं ठाकुर जाति का होने के कारण इस तरह की रचना के लिए अदम को अपने गांव के ठाकुरों का विरोध सहना पड़ा। इन्हें ठाकुर जाति पर कलंक तक कहा गया। अदम इस तरह की बातों की परवाह ना करते हुए अन्याय के खिलाफ निरंतर लिखते रहे।
ग्राम समाज में आर्थिक साधनों पर सवर्णों का अधिकार रहा है। दलित और शुद्रों को इनके अधीन काम करना पड़ता था। जीविका के लिए सवर्णों पर निर्भर रहना पड़ा। सवर्णों द्वारा दलितों से बेगार करवाई जाती थी। दिन रात मेहनत करने के बावजूद इन्हें जूठन खाने के लिए मजबूर होना पड़ता था, जिसका चित्रण अधिकांश रचनाओं में मिलता है। यदि कोई बेगार करने से मना करता है, तो उसे प्रताड़ित किया जाता था, कहीं-कहीं तो जान तक गंवानी पड़ जाती थी। अदम ने अपने गांव में बेगारी प्रथा तथा उसके शोषण की प्रक्रिया को निरंतर देखा है –

बंद कल को क्या किया मुखिया के खेतों में बेगार
अगले दिन ही एक होरी और बेघर हो गया। 8

पंचायत, पुलिस आदि कोई भी इस शोषण के खिलाफ दलितों का साथ नहीं देते, क्योंकि गांव की संपूर्ण न्यायिक व्यवस्था पर सवर्णों का अधिकार रहा है ।
गांव का वातावरण बहुत ही सुंदर और मनोरम होता है। साफ-स्वच्छ हवा, फूल-पत्ते, नदी-झरने, खेत-खलियान सब मन को मोहित करने वाले होते हैं। गांव की सुंदरता का चित्रण हिंदी साहित्य में अधिकांश मिलता है। अदम की शायरी में यह खुशनुमा मंजर बहुत कम है। गांव की गरीबी, भुखमरी, बदहाली लेखक को इतना परेशान करती है कि प्राकृतिक सौंदर्य आंखों से ओझल हो जाता है।

गांव की पनघट की रंगीनी बयां कैसे करें
भुखमरी की धूप से दिलगीर है मेरी गजल। 9

प्रेम वर्णन के लिए ग़ज़ल प्रसिद्ध रही है। ग़ज़ल की शुरुआत ही प्रेम वार्तालाप से हुई। जिस प्रकार अदम की ग़ज़ल गांव के सौंदर्य से विमुख रही, उसी प्रकार प्रेम वर्णन भी इनकी ग़ज़लों में नहीं मिलता। अदम के लिए पहली समस्या गांव की भूख से मुठभेड़ करना था। अतः वह साफ कहते हैं –

पेट के भूगोल में उलझा हुआ है आदमी
इस अहद मैं किसको फुर्सत है पढ़ें दिल की किताब। 10

अदम गोंडवी गांव गली के कवि हैं। इन्होंने भारत के बदलते राजनीतिक मिजाज को ग़ज़लों में व्यक्त किया है। इस मिजाज के बीच ग्रामीण समाज की जो उपेक्षा हुई है, उसे अदम ने बखूबी बयान किया है। “दुष्यन्त ने अपनी ग़ज़लों में शायरी की जिस नई राजनीति की शुरूआत की थी, अदम ने उसे मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश की है, जहां से एक-एक चीज बगैर किसी धुंधलके में पहचानी जा सके।“11
इनकी ग़ज़लों में व्यवस्था पर चोट है, श्रम की महत्ता का प्रतिपादन है, किसान मजदूर की पक्षधरता है और जनता की शक्ति पर यकीन है। अदम की ग़ज़लों में उर्दू के कई शब्द मिलते हैं। साथ ही ठेठ देहाती गंवाइ-गंवार अवधी के मुहावरे मिलते हैं। इनकी अधिकांश ग़ज़लें पाठकों को कंठस्थ हैं। अदम गोंडवी जीवन पर्यंत किसानी से जुड़े रहकर साहित्य रचना करते रहे। वह सच्चे मायनों में गांव के प्रति प्रतिबद्ध लेखक हैं।

सन्दर्भ सूची :

  1. दुष्यन्त कुमार; साये में धूप; पृष्ठ सं. 15
  2. अदम गोंडवी; धरती की सतह पर; पृष्ठ सं. 29
  3. अदम गोंडवी; धरती की सतह पर; पृष्ठ सं. 28
  4. सम्पादक – विद्याधर शुक्ल; लेखन; पृष्ठ सं. 76
  5. अदम गोंडवी; धरती की सतह पर; पृष्ठ सं. 32
  6. अदम गोंडवी; धरती की सतह पर; पृष्ठ सं. 32
  7. अदम गोंडवी; धरती की सतह पर; पृष्ठ सं. 84
  8. अदम गोंडवी; धरती की सतह पर; पृष्ठ सं. 33
  9. अदम गोंडवी; धरती की सतह पर; पृष्ठ सं. 57
  10. अदम गोंडवी; धरती की सतह पर; पृष्ठ सं. 31
  11. सम्पादक – विद्याधर शुक्ल; लेखन; पृष्ठ सं. 74

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू

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