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कब तक बदनाम होगी ‘मुन्नी’

राजीव मणि

शाम का समय है। सहरसा का एक पुराना मुहल्ला। मुहल्ला का नाम खिरियाही। कुछ लोग इसे परिवर्तन नगर भी कहते हैं। खैर, नाम में क्या रखा है? आइए, मुख्य बातों पर। मुजरे का वक्त हो गया है। मीराबाई अपने कोठे पर मुजरे को तैयार हो रही है। रह-रह कर उसकी बेटी सानिया आ-जा रही हैं। आज महफिल में ज्यादा लोग नहीं हैं। जो हैं, वे 50-100 रुपये वाले। फिर भी मीराबाई नाचेगी। चंद रुपयों के लिए। उस्ताद तबले की थाप को मिला रहे है। ‘मौसी’ कुछ बकबक कर रही है। इसी बीच आवाज आयी – अरे मीराबाई और कितना तड़पाओगी! मीराबाई अपने दरबेनुमा कमरे से निकलकर मुख्य कमरा में आ जाती है। हार्मोनियम पर धुन शुरू हो जाता है। इन्हीं लोगों ने ले लिया दुपट्टा मेरा…।
जी हां, यह तो एक कोठे की बात हुई। यहां ऐसे-ऐसे कई कोठे हैं। इन कोठों पर कुल 250 परिवार। सबका धंधा समान। सामाजिक ढांचा एक-सा। आर्थिक हालात मिलते- जुलते। बस, अंतर है तो इतना कि अलग-अलग घरों और तरीकों से ये यहां पहुंचीं। कइयों का जन्म यहीं हुआ है। बाप का ठीक-ठाक पता नहीं। हां, मां का नाम मालूम है। पर क्या करे? आखिर मां तो मां है, अपनी ‘लाडली’ को ‘नरक’ में कैसे ढकेल दे। मन में कई भाव हैं। कुछ विद्रोह के भी। पर कुछ कर नहीं सकती। इतना जरुर कहती है कि मजबूरी है साहेब। पेट भी तो पालना है। इसलिए ही नाच-गाना करना पड़ता है और ग्राहक हो तो शरीर भी बेचना पड़ता है। ऊब चुकी हूं इससे। नरक से निकलना चाहती हूं। लेकिन ‘अंधेरे’ में कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। चैखट से बाहर कदम निकालूं तो ‘कुत्ते’ नोचने को दौड़ते हैं। ऐसे में अपनी बेटी को लेकर कहां जाऊं? इस मां का नाम है राबिया।
हालांकि ‘मां’ के नाम नहीं होते। मां कहना अपने आप में ही काफी है। लेकिन हालात ने इस मां को राबिया बना दिया। सभी राबिया बाई के नाम से ही जानते हैं। मीराबाई का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। वह कहती है, ‘‘नाच-गाना दिखाकर और शरीर बेचकर ही हमलोगों का गुजारा चलता है। कई रईस और बिगड़ैल इस कोठे पर आते हैं। यहां आकर सभी का रंग एक जैसा ही होता है। बाहर में चाहे लाख शरीफ बनें।’’ वह आगे बताती हैं- ‘‘बनारस में वेश्याओं के लिए समर्पित एक संस्था है गुड़िया। यह संस्था वेश्याओं को नरक से निकालने और मुख्य धारा से जोड़ने को काम कर रही है। पिछले दिनों गुड़िया ने बनारस में एक राष्ट्रस्तरीय तवायफ महोत्सव का आयोजन किया था। मैं भी वहां गयी थी। मुझे वहां कला के लिए पुरस्कृत किया गया। लेकिन मैं सोचती हूं, सब बेकार है। मैं भूल गयी थी कि मेरी औकात क्या है? यहां तो सब नोचने को दौड़ते हैं।’’
तो यह है खिरियाही का दर्द। और जब दर्द हुआ, तो कराहने की आवाज भी निकली। कहावत है न, बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। सो बात दूर तक गयी भी। सहरसा के ही परचम नामक एक स्वयंसेवी संस्था ने यह दर्द महसूस किया। प्रशासन के साथ कई बैठकें हुईं। कुछ जागरुकता अभियान चलाये गये। कुछ साफ-सफाई के कार्यक्रम। पर इससे क्या होना था। जो मूल समस्याएं थीं, वैसे ही रह गयीं। हां, वेश्याओं ने कंडोम का इस्तेमाल जरुर शुरू कर दिया है।
सिमरी-बख्तियारपुर की ओर जानेवाली सड़क के किनारे झोपड़ियों- मकानों के आगे ‘नर्तकी मंडली’ का बोर्ड लगा दिखता है। सहरसा रेलवे स्टेशन से महज 500 गज की दूरी पार करते-करते आवाज आने लगती है। उस तंग गली से, जहां की शाम रंगीन होती है और सजती है हुस्न की मंडी। किसी कोठे से आ रही आवाज है – ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए…।’ लेकिन चलते-चलते एक सवाल मेरे मन में रह ही जाता है। आखिर मुन्नी को बदनाम किया तो किसने?

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