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लॉकडाउन

आशा दिनकर ‘आस’

लॉकडाउन की प्रक्रिया शुरू हुए तीन-चार दिन हो गए। रामू और उसकी पत्नी चिंता में बैठे हुए बातचीत कर रहे हैं कि अब हमारा क्या होगा।
पत्नी कहती है, ‘‘सुनो जी, दो-तीन दिन का राशन था, अब वह भी खत्म हो गया है। अब क्या करें ? कैसे काम चलेगा ? हम गरीब आदमी रोज कमाने जाते हैं। शाम को दिहाड़ी मजदूरी मिलती है, तब घर का राशन आता है। रात का बचा भोजन सुबह भी काम आ जाता है। अभी तो तीन ही दिन गुजरे हैं, आगे क्या होगा, न नौकरी है न चाकरी, यहां पड़े हैं गैर देश में… नौकरी की खातिर… यहां कोई अपना नहीं है। जो दो-चार लोग जान-पहचान के हैं, उनकी भी हालत हम से बेहतर तो नहीं है।’’
‘‘दो दिन तो जैसे-तैसे काम चल गया, अब कैसे करें ? दिन में मकान मालिक भी तगादा कर गया है कि टाइम से किराया दे देना, नहीं तो मकान खाली कर देना। हम भी किराये के आसरे बैठे हैं। हम कौन सी सरकारी नौकरी करते हैं जो महीने बाद तनख्वाह आ जायेगी।’’
‘‘इसी उधेड़बुन में और दो दिन निकल गये। जैसे तैसे चाय पीकर दिन गुजार दिये। बचा हुआ चावल भी डिब्बा झाड़ के ले आयी हूं। तुमने तो मुंह में अन्न का दाना भी नहीं डाला। तुम्हें कुछ हो गया तो हमारा और दो छोटे-छोटे बच्चों का क्या होगा ?’’
रामू का दिमाग सुन्न हो गया है। उसे समझ नहीं आ रहा कि अब क्या होगा। अभी बाहर अपने जैसे दोस्तों से मिला था, सब ऐसे ही परेशान हैं। एक ने बोला, ‘‘भैया अपने गांव चलते हैं, कम से कम वहां अपनी छोटी-सी कोठरिया से कोई निकालेगा तो नहीं। गुजर कर लेंगे वहां ऐसे ही। कुछ दिन का अनाज तो अपना बनिया भी दे देगा। तब तक कुछ न कुछ गांव में ही छोटा-मोटा काम कर लेंगे। यहां भैया कोरोना बीमारी ने घेर लिया है। गांव में परिवार के लोग तो कम से कम साथ होंगे। सब बीमारी में देख तो लेंगे और मर गये तो मरघट में जला देंगे, लेकिन शहर में कैसे गुजर करेंगे ? यहां तो कुछ नहीं होगा। अब शहर में नहीं रहना हमें। यहां तो कोठरिया में भूखे मर जायेंगे, लेकिन कोई पूछने नहीं आने वाला। अब सब मन बना लो, एक साथ गांव निकल लेंगे। रास्ते में कोई गाड़ी मिल गई तो ठीक, नहीं तो पैदल ही निकल लेंगे।’’
घर आते ही अपनी घरवाली को बोल दिया – ‘‘अपना सामान बांध ले, हम सब गांव निकल रहे हैं। मुंह अंधेरे … और सुन… सामान उतना ही लेना जितना हम दोनों उठा सकें। बाहर का पता नहीं क्या हाल है, पूरा शहर बंद है, गाड़ियां बंद हैं। कैसे अपने घर जा पायेंगे, सब बाहर निकलकर ही तय हो पायेगा।’’

फिर थका-हारा आकर चारपाई पर आकर लेट गया और छत पर टकटकी लगाए देखने लगा। पूरा दृश्य आंखों के आगे घूम गया। गांव में रहते थे तो शहर जाने की सोचना भी बहुत अच्छा लगता था। बच्चों और बड़ों के भी सपने होते हैं कि छोरा गांव से निकल कर शहर में बस गया। दो पैसे कमाने खाने लगा, हमें बस और क्या चाहिए। हम भी खुश साथ ही बुजुर्ग भी खुश, मानो उनका जन्म सफल हो गया हो। गांव से बाहर निकल कर शहर की जगमगाहट देखकर लगता है कि जैसे शहर में स्वर्ग बसता है। दूर से देखने में शहर एक जगमगाता हुआ सितारा लगता है, जिसमें रहना हरेक का सपना होता है। लेकिन शहर के अंदर की बात कोई नहीं जानता, कोई किसी की परवाह नहीं करता। मरना-जीना सब अपने-अपने घर में। रोटी कमाने की आपा-धापी में उलझकर रह जाते हैं। कोई आपस में और आसपास किसी से बात नहीं करता, घर जाना तो दूर की बात है। कभी गली में निकलें तो आमना-सामना हो जाता है, तब जरूर शिष्टाचार में नमस्कार कर लेते हैं। हम सब अपने काम पर चले जाते हैं, समय गुजर जाता है, नहीं तो आदमी की बस्ती में भी अकेले पड़ जाते हैं।
एक नजर कुलबुलाते बच्चों पर डाली, जो बिना दूध के बिस्तर पर आड़े तिरछे पड़े हुए थे। मां ने डांटकर चुप करवा दिया था। कहा – ‘‘तुम्हें गांव घूमने जाना है तो चुप होकर सो जाओ।’’ बड़ा बच्चा पांच साल का है, डांटने पर चुप्पी साध गया। मगर कनखियों से देख रहा था कि मां सामान बांध रही है। इसका मतलब था, हम गांव जायेंगे। जब तब अपनी आंखें मलते हुए सामान बंधाई देख लेता और मौन साध लेता, किन्तु छोटा तीन साल का है, वो रोना बंद नहीं कर रहा। उसे कैसे समझाएं कि बेटा भूख से ज्यादा हमें तो जान बचाने की पड़ी है। वो अलग बात है कि मर तो भूख से भी जाते हैं, लेकिन अपनी आंखों के सामने भूख से बिलबिलाते हुए बच्चों को देखना भी बेमौत मरना ही है। जिधर देखता हूं, उधर ही परेशानी मुंह बाये खड़ी है।
मैं फिर पत्नी को झिंझोड़ कर कहता हूं, ‘‘देख ले, कुछ सामान रह तो नहीं गया पैक करने को। बस चार बजने में एक घंटा रह गया है। सुबह सवेरे निकलेंगे तो बस अड्डे तक पैदल-पैदल निकल जायेंगे। इसके अलावा कोई चारा नहीं है। आगे की राम जाने।’’
छोटा बच्चा थोड़ी झपकी लेकर फिर रोने लगा। बड़ा बच्चा भी अनमयस्क-सा टुकुर-टुकुर देखने लगा। अब मुझ में धीरज नहीं बचा था, शाम को दो-चार बिस्किट के पैकेट ले आया था रास्ते के लिए। एक पैकेट खोल कर बच्चों को थमा दिया।
सब बैग बना लिए … चार बैग फिर भी बन गये। दो छोटे बैग पत्नी ने उठा लिए और छोटा बच्चा भी उठा लिया। मैंने दो बड़े बैग उठा लिए और बड़े को गोद में उठा लिया। अपने कमरे पर एक नजर डाली जिससे आत्मीयता हो गई थी। कमरे का दरवाजा धीरे से बंद किया और निकल पड़े पैदल गांव की ओर… अपने देश… अपने घर।

पता : मीरा बाग अपार्टमेंट, आउटर रिंग रोड, नीयर सहगल नर्सिंग होम, नई दिल्ली-110063

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