Naye Pallav

Publisher

बहते पानी की तरह है प्रेम

14 फरवरी : वैलेंटाइन डे

रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस का शासन था। उसके अनुसार विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि कम होती है। उसने आदेश दिया कि उसका कोई सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। संत वैलेंटाइन ने इस क्रूर आदेश का विरोध किया। उन्हीं के आह्वान पर कई सैनिकों और अधिकारियों ने विवाह किए। अपने आदेश का विरोध होता देख क्लॉडियस ने 14 फरवरी, सन् 269 को संत वैलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया। तब से उनकी स्मृति में हर साल 14 फरवरी को प्रेम दिवस के रूप में मनाया जाता है।


राजीव मणि

प्यार की कोई उम्र नहीं होती। महीना, तारीख भी नहीं। किसी जाति-धर्म के बंधन को भी यह नहीं मानता। अमीर-गरीब जैसी चीजों से भी इसे दूर-दूर तक मतलब नहीं। तन, रूप-रंग से भी कोई खास लेना-देना नहीं। मजेदार यह कि इसे चाहकर भी किया नहीं जाता, बस हो जाता है!
जी हां, यह प्यार है। आप इसे प्रेम कह लें या मोहब्बत। कइयों ने अलग-अलग नाम दे रखा है। लेकिन, जब हो जाये तो क्या! ना भूख लगती है और ना प्यास। ना दिन दिखता है ना रात। बस प्रेयसी का मासूम चेहरा ही हर वक्त चारो ओर दिखता है। कहने को तो कई लोग इसे ‘रोग’ भी कहते हैं। कुछ ‘पागलपन’ भी कह दिया करते हैं। लेकिन, प्रेमी-प्रेमिकाओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सच कहें तो इन्हें इधर-उधर की बातें सुनने की फुर्सत ही कहां। इनकी तो अपनी ही दुनिया होती है। अनोखी दुनिया! इस दुनिया में चांद-तारों की बात होती है। चांदनी रात में खो जाने जैसी बातें होती हैं। प्रेमपत्र का जिक्र होता है। मुस्कान, जुल्फें, झील सी आंखें, मोतियों जैसे दांत और ना जाने क्या-क्या।
इतना ही नहीं, इस प्रेम के चक्कर में सांप भी रस्सी दिखती है। लैला भी हसीन! इतिहास ने कुछ को ‘प्रेमग्रंथ’ में सहेज कर रखा है। कुछ अमर प्रेम इतिहास के पन्नों में समा नहीं पाये, इसके बावजूद अमर रहे। कुछ प्रेम कहानी ने इतिहास को बार-बार लिखने को प्रेरित किया। कुछ प्रेम कहानी तो इस धरती जैसे विशाल कैनवास पर ही ताजमहल के रूप में लिखी गयी। कुछ प्रेम कहानी जान देकर भी। इसके विभिन्न रंग हैं। राजमहल की जिन्दगी भी मुहब्बत पर कुर्बान कर दी गयी। राजा को फकीर भी बनना पड़ा। खास को आम।
हांलाकि प्यार करना आसान नहीं। इसे निभाना तो और भी कठिन है। प्रेमियों के हजार दुश्मन तब भी थे, आज भी हैं। बंदिशें, पहरें और ना जाने क्या-क्या। लेकिन, प्रेमियों को इससे क्या फर्क पड़ता है। प्रेम तो बहता पानी की तरह होता है, कहीं न कहीं से अपना रास्ता बना ही लेता है।

प्रेम करेंगे तो रूठना-मनाना भी लगा रहेगा। नाज-नखरे भी होते रहेंगे। कभी गांठ पड़ता भी दिखेगा, कभी दूर होता प्यार भी। इन सब के बावजूद जो खत्म हो जाये वह प्यार ही क्या। यह तो कई जन्मों का नाता होता है। लोग कहते हैं, प्रेम में ही ईश्वर बसता है। और वही लोग प्रेम पर पहरा लगाते हैं। इन पहरेदारों को क्या मालूम कि सारी समस्याओं का समाधान प्रेम में ही है। यह तो प्यार करने वाले ही जानते हैं कि प्रेमनगरी से बढ़कर कोई दूसरा तीर्थस्थल नहीं होता। इसकी कल्पना कइयों ने की, किसी ने बसाया नहीं। अन्यथा इस धरती पर भी एक स्वर्ग होता।

विद्वानों, लेखकों और विचारकों ने प्यार को अपने-अपने नजरिए से देखा और बयां किया है। पेश है कुछ विचार :
महान विचारक लेमेन्नाइस :
 जो सचमुच प्रेम करता है, उस मनुष्य का हृदय धरती पर साक्षात स्वर्ग है। ईश्वर उस मनुष्य में बसता है, क्योंकि ईश्वर प्रेम है।
दार्शनिक लूथर : प्रेम ईश्वर की प्रतिमा है और निष्प्राण प्रतिमा नहीं, बल्कि दैवीय प्रकृति का जीवंत सार, जिससे कल्याण के गुण छलकते रहते हैं।
मनोवैज्ञानिक वेंकर्ट : प्यार में व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति की कामना करता है, जो एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में उसकी विशेषता को कबूल करे, स्वीकारे और समझे। उसकी यह इच्छा ही अक्सर पहले प्यार का कारण बनती है। जब ऐसा शख्स मिलता है, तब उसका मन ऐसी भावनात्मक संपदा से समृद्ध हो जाता है, जिसका उसे पहले कभी अहसास भी नहीं हुआ था।
मनोवैज्ञानिक युंग : प्रेम करने या किसी के प्रेम पात्र बनने से यदि किसी को अपनी कोई कमी से छुटकारा मिलता है, तो संभवतः यह अच्छी बात होगी। लेकिन, इसकी कोई गारंटी नहीं है कि ऐसा होगा ही। या इस तरह से उसे मुक्ति मिल ही जाएगी।
मनोवैज्ञानिक हॉर्नी : प्रेम में निष्कपटता और दिल की गहराई बहुत जरूरी है।
मैस्लो : सच्चा प्यार करने वालों में ईमानदारी से पेश आने की प्रवृत्ति होती है। वे अपने को खुलकर प्रकट कर सकते हैं। वे बचाव, बहाना, छुपाना या ध्यानाकर्षण जैसे शब्दों से दूर रहते हैं। स्वस्थ प्रेम करने वाले एक-दूसरे की निजता स्वीकार करते हैं। आर्थिक या शैक्षणिक कमियों, शारीरिक या बाह्य कमियों की उन्हें चिन्ता नहीं होती, जितनी व्यावहारिक गुणों की।
सुप्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम : जिसके साथ होकर भी तुम अकेले रह सको, वही साथ करने योग्य है। जिसके साथ होकर भी तुम्हारा अकेलापन दूषित ना हो। तुम्हारी तन्हाई, तुम्हारा एकान्त शुद्ध रहे। जो अकारण तुम्हारी तन्हाई में प्रवेश ना करे। जो तुम्हारी सीमाओं का आदर करे। जब तुम्हारे एकान्त पर आक्रामक ना हो। तुम बुलाओ तो पास आए। इतना ही पास आए, जितना तुम बुलाओ। और जब तुम अपने भीतर उतर जाओ तो तुम्हें अकेला छोड़ दे।
खलील जिब्रान : प्रेम केवल खुद को ही देता है और खुद से ही पाता है। प्रेम किसी पर अधिकार नहीं जमाता, ना ही किसी के अधिकार को स्वीकार करता है। प्रेम के लिए तो प्रेम का होना ही बहुत है। कभी ये मत सोचो कि तुम प्रेम को रास्ता दिखा रहे हो या दिखा सकते हो, क्योंकि अगर तुम सच्चे हो, तो प्रेम खुद तुम्हें रास्ता दिखाएगा। प्रेम के अलावा प्रेम की और कोई इच्छा नहीं होती, पर अगर तुम प्रेम करो और तुमसे इच्छा किए बिना ना रहा जाए, तो यही इच्छा करो कि तुम पिघल जाओ प्रेम के रस में और प्रेम के इस पवित्र झरने में बहने लगो।
ईसा मसीह : प्रेम सबसे करो, भरोसा कुछ पर करो और नफरत किसी से न करो।
अज्ञात : पुरुषों का प्रेम आंखों से और महिलाओं का प्रेम कानों से शुरू होता है।
अब्राहम लिंकन : किसी दुश्मन को पूरी तरह बर्बाद करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उससे प्रेम करना शुरू कर दो।
सेंट आॅगस्टीन : प्यार से हमेशा कोसों दूर रहने से अच्छा है, प्यार करके तबाह हो जाना।
मुंशी प्रेमचंद : प्रेम सीधी-साधी गाय नहीं है, खूंखार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आंख नहीं पड़ने देता।
महात्मा गांधी : प्रेम से भरा हृदय अपने प्रेम पात्र की भूल पर दया करता है और खुद घायल हो जाने पर भी उससे प्यार करता है।
प्लेटो : प्यार की छुअन से हर कोई कवि बन जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Get
Your
Book
Published
C
O
N
T
A
C
T