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संकट में दीघा का मालदह आम

राजीव मणि

थोड़ा इंतजार कीजिए। बाजार में आने ही वाला है विष्व प्रसिद्ध दीघा का दुधिया मालदह आम। चूंकि इस बार यहां आम के पेड़ों पर कम मंजरी लगी है, अतः इसका थोड़ा असर बाजार पर भी पड़ेगा। षुरूआत में थोड़े ऊंचे भाव के साथ नाज-नखरे दिखाते हुए ये आम तराजू के पलड़ों पर चढ़ेंगे। लेकिन, कुछ ही दिनों बाद इनके नखरे जाते रहेंगे। ऐसा करीब हर सीजन में हुआ है।
दुधिया मालदह आम के बाजार के समीकरण को समझने से पहले इस साम्राज्य के ‘बैक ग्राउन्ड’ को जानना जरूरी है। दरअसल आज मालदह के जितने भी पेड़ हैं, करीब 90 फीसदी पुराने और ‘वृद्ध’ हो चुके हैं। न तो नए कॉलम लगाए जा रहे हैं और न ही इनकी समुचित सेवा की जा रही है। दूसरी तरफ करीब 75 फीसदी बगीचा यहां काटे जा चुके हैं और उन स्थानों पर बड़े-बड़े मकान बन चुके हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण जो है, वह इन बगीचों के लिए षुभ नहीं है। उपेक्षा, घोर उपेक्षा!
एक षिक्षित बगीचा मालिक के मुंह से ही यह जान लेते हैं – ‘‘जितने भी आम के वृक्ष आज दिख रहे हैं, वे बगीचा मालिकों के दादा-परदादाओं द्वारा लगाए गये हैं। तब सस्ती का जमाना था। लोगों के पास काफी जमीन थी और पैसे भी। इसका असर बाद की पीढ़ियों पर पड़ा। बाप-चाचा तक तो कुछ ठीक चला। लोग इन वृक्षों की सेवा भी करते रहे, लेकिन वर्तमान पीढ़ी भटक गई। उन्हें इन बगीचों से कोई मतलब नहीं रहा। उनके दिमाग में बस एक ही बात थी कि वे अथाह जमीन के मालिक हैं। परिणाम हुआ कि इस जमीन की बदौलत ही उनकी जिन्दगी चलने लगी और जब जरूरत हुई एक-आध कट्ठा जमीन बेच दी। साथ ही आम के फसल को भी वे बस ऊपरी आय मानकर चलने लगे और इसपर ध्यान न देकर औने-पौने दामों में सीजन में बगीचा बेचने लगे। इसका असर बाजार पर पड़ा और आम के दामों को लेकर सदा भ्रम की स्थिति बनी रही। इस भ्रम का एक कारण यह भी है कि उन्हें मेहनत तो करनी पड़ी नहीं। राम भरोसे जो कुछ हुआ, बेच दिया। ऐसे में वे इन आमों की कीमत क्या जानें।
मालदह आम के दामों के गणित कुछ ऐसे ही गणितिय सूत्रों पर सिद्ध किये जाते रहे हैं। पिछले एक दषक का रिकार्ड कुछ यही कहता है। दषक के सभी वर्षों में आम का वास्तविक मूल्य 20 से 30 रुपए प्रतिकिलो ही रहा। यह दर बगीचा में बेचे जाने का है। पहले आम के दानों (आकार) को देखकर भाव तय किया जाता था। अब तो मंजरी लगते ही बोली लग जाती है। फल तैयार होने पर आप चाहें तो बगीचा में आकर अपने मनपसंद पेड़ से सामने आम तुड़वाकर इस कीमत पर ले जा सकते हैं। लेकिन खुले बाजार में पहुंचते ही इस बादषाह आम के नाज-नखरे सातवें आसमान पर होने लगते हैं। जैसी कालोनियां, वैसे दाम! बजार-हाट, मुहल्लों और खरीदारों के स्टैण्डर्ड पर भी दाम निर्भर करता है। और यह बाजार है। सारा खेल सौदा पटने का होता है।
धीरे-धीरे युवा होते टिकोलों पर जवानी का रस कबतक चढ़ेगा, यह मौसम पर निर्भर है। अगर तेज गर्मी और कभी-कभी पानी की बूंदे मिल जाये, तो फिर कहना ही क्या। चारो ओर मालदह की धूम मच जाएगी। षायद उसी तरह जैसे किसी राजा ने अपने साम्राज्य विस्तार का प्रयास किया हो! धैर्य रखिए, आने ही वाला है दुधिया मालदह आम।

आज भी बेताज बादशाह
एक तो फलों का राजा आम और उसपर भी अपनी बिरादरी में सबपर हुकूमत करने वाला बेताज बादषाह। जी हां, दुधिया मालदह के साम्राज्य की बात हो रही है। करीब सौ वर्ष पुराना साम्राज्य है इसका। और तब से न सिर्फ भारत, बल्कि कई देषों पर राज किये हैं इसने। यहां तक कि बिटिष सरकार की हुकूमत भले ही कभी हिन्दुस्तान पर रही थी, तब भी इस बेताज बादषाह ने न सिर्फ वहां की महारानी, बल्कि वहां के कई रइसों को भी अपने कदमों में ला पटका था। इतना ही नहीं, अमेरिका, इजिप्ट, अरब, इंडोनेषिया, जापान सहित करीब सभी पड़ोसी देषों में मालदह आम के नाम की जबरदस्त चर्चा थी। पेटी की पेटी, ट्रक के ट्रक आम यहां से उन देषों को निर्यात होते थे। अति विषेष लोगों की बात करें, तो इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर, प्रसिद्ध गायिका सुरैया सहित दर्जनों लोग हैं, जिन्होंने इस आम से प्रभावित होकर बार-बार यहां आने की इच्छा प्रकट की थी।
ऐसे में यह सवाल जेहन में उठना लाजिमी है कि इस दिवानगी की वजह क्या थी। खुबियां एक हों तब तो! इसके ढेरो कारण हैं। लेकिन इससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस बगीचे को लगाया-बसाया किसने था। क्योंकि ‘सिर्फ आम खाओ और गुठलियों की परवाह मत करो’ से काम नहीं चलने वाला। आम के साथ गुठलियों की परवाह भी जरूरी है। वजह है, गुठलियों का उपयोग आयुर्वेद में दवा बनाने के रूप में किया जाता है। जीवन रक्षक दवा।
हां, बात बहुत पुरानी है। सौ साल से कम नहीं, ज्यादा ही होते होंगे। लखनऊ में फिदा हुसैन नाम के एक नवाब हुआ करते थे। एक बार वे घुमते-फिरते दीघा आ पहुंचे। यहां गंगा तट और आसपास के क्षेत्र ने उन्हें काफी प्रभावित किया। फिर क्या था, नवाब साहब ने यहां एक किला का निर्माण करवाया। जब भी उन्हें मौका मिलता, यहां आराम फरमाने आ जाते। नौकर-चाकर एवं ऐषो-आराम की सारी चीजें नवाब साहब की कोठी में मौजूद थीं। क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि नवाब साहेब दूध और पेड़-पौधों के काफी षौकीन थे। सो दूध के लिए काफी गाय-भैंस पाल रखी थी। साथ ही आम के पेड़ भी कोठी के आसपास ढेर सारे लगवाये। जब नवाब साहब के यहां दूध काफी ज्यादा होने लगा और खाने वाले लोग कम, तो एक समस्या उठ खड़ी हुई कि आखिर दूध का क्या हो!
नवाब साहब ने अपने नौकरों को आदेष दिया – बचे हुए दूध को आम के पेड़ की जड़ में डाला जाए। फिर क्या था, आम के पेड़ को पानी की जगह दूध से सींचा जाने लगा और कुछ वर्षों बाद उन पेड़ों की एक नई किस्म अभरकर सामने आई। इस प्रजाति के विकास के कई कारण थे। गंगा का किनारा, उपजाऊ मिट्टी, उपयुक्त जलवायु और दूध का डाला जाना। इस नई प्रजाति के विकास से लोग काफी अचंभित हुए और इन वृक्षों का नाम ही ‘दूधिया मालदह’ रख दिया गया। बगीचा मालिक संजय बताते हैं कि करीब एक दषक पहले तक यहां करीब दो सौ आमों की प्रजातियां थीं। आज कई प्रजातियां हमेषा के लिए यहां से खत्म हो गईं। आज ‘मैंगो बेल्ट’ का एक चौथाई हिस्सा ही बचा है। यहां बड़े-बड़े मकान तेजी से बनते जा रहे हैं। साथ ही गंगा भी रूठ गयी।
दूधिया मालदह आम की कुछ खूबियां हैं, जिसके कारण यह आजतक बेताज बादषाह बना हुआ है। सर्वप्रथम तो यह अपने नाम के अनुसार स्वाद में दूध की मिठास लिए हुए है। साथ ही पतला छिलका, काफी पतली गुठली और बिना रेषे वाले गुदे के कारण यह हर किसी के दिलों पर राज करता है।
आज लखनऊ के नवाब नहीं रहे और उन जैसा कद्रदान भी नहीं। आज लोग दूधिया मालदह आम से सिर्फ खाने भर की मोहब्बत करते हैं। इसके अस्तित्व को लेकर किसी को परवाह नहीं। हां, याद आया एक परिवार है यहां। इरफान साहब का परिवार। कभी इनके अब्बू को भी नवाब साहब की तरह ही इन आम के बगीचों से मोहब्बत हो गयी थी। आषिकी का भूत ऐसा चढ़ा कि दूधिया मालदह आम ही जैसे जीवन का हिस्सा बन गया। फिर क्या था, इरफान साहब को भी यह षौक विरासत में मिल गया। और फिर इरफान साहब से उनके बेटों को। इरफान साहब अपने समय तक इन पेड़ों को पुत्र समान ही मानते रहे। जब इरफान साहब की पनाह में कुछ बगीचे थे, तो उनसे बात हुई थी। उन्होंने कई राज खोले।
इरफान साहब के अब्बू का नाम नवी हुसैन था। उनके अब्बू ने जार्ज पंचम को आम खिलाया था। साथ ही 1952 में राजकपूर और सुरैया दीघा आये थे। तब इस बगीचे में फले बड़े-बड़े आमों को देखकर राजकपूर ने फिल्म की षूटिंग के लिए इसे सर्वोत्तम जगह बताया था। महारानी विक्टोरिया के मुंह से तो आम खाते ही ‘अद्वितीय’ षब्द निकल पड़ा था। और, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने ‘अविस्मरणीय’ की संज्ञा दी थी। राजेन्द्र बाबू तो इस आम के इतने दिवाने थे कि उन्होंने सदाकत आश्रम स्थित अपने निवास के आसपास ही दूधिया मालदह के कई कॉलम लगवाए। आज भी कुछ पुराने पेड़ यहां हैं।
कहते हैं न कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। बात दूर तलक गयी भी। सन् 2000 में केन्द्र सरकार ने दीघा के बगीचा को ‘मैंगो बेल्ट’ घोषित कर दिया। साथ ही 60 लाख रुपये बगीचा के लिए केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को दिये थे। लेकिन, इस बगीचे की किस्मत सुधरने के बजाये बिगड़ती चली गई। वैसे जिन लोगों ने इन बगीचों से मोहब्बत की, बदले में उसे भी काफी सम्मान मिला। प्रमाण है पहले कई बार इस आम को देष-विदेष के आम प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। चलते-चलते इस आम के सम्मान में यह जरूर कि इसकी प्रतिष्ठा व मांग का अनुमान आज इसी से लगाया जा सकता है कि बाजार में बिकने वाले इससे मिलते-जुलते दूसरी किस्म के आमों को भी दूधिया मालदह आम बताकर बेच दिया जाता है।

एक और दुनिया बसती है यहां
सिर्फ आम के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है दीघा! एक और दुनिया बसती है यहां। यह है रंग-बिरंगी चिड़ियों की हसीन दुनिया। जितने मीठे आम, उससे कोई कम न होगी इनकी मधुर सुरीली आवाज। जैसे दोनों में कोई पुराना संबंध रहा हो। चाहे वह कोयल की कूंक हो या फिर कठफोड़वा, बुलबुल, गोरैया या किसी अन्य की। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इनकी आवाज के सरगम से ही आम बढ़ते, पकते हैं या फिर देखकर इनकी खुषियां बढ़ जाती है। चलो आया बहारों का मौसम! मिल बांटकर खाएं मालदह आम। यह प्रकृति का एक अनोखा और मदहोष कर देने वाला नजारा है। षायद स्वर्ग-सा!
जी हां, आप यह नजारा राजधानी स्थित प्रसिद्ध दीघा बगीचा में देख सकते हैं। इन चिड़ियों में कुछ तो स्थायी रूप से यहां निवास करती हैं और कुछ जाड़े के प्रारंभ में यहां आती हैं, जो गर्मी के अंत तक रहेंगी। जाड़ा का मौसम इनका प्रजनन काल है। अपने बच्चे को जन्म देने के बाद जब ये अच्छी तरह उड़ सकेंगी, तो वापस चली जायेंगी। अपने देष, यह संदेष लेकर कि दीघा का मालदह किस्मत वालों को ही खाने को मिलता है।
उल्लू, कबूतर, कठफोड़वा, कौवा, कोयल, गिद्ध, गोरैया, चमगादड़, चील, नीलकंठ, बाज, बुलबुल, बया, तोता, हिरामन तोता, बगुला और न जाने क्या-क्या! कुछ चिड़ियों के रंग इतने मनभावन कि देखने के बाद नजर ही न हटे। लाल, धब्बेदार लाल, चमकीला हरा, चमकीला काला, दूध की तरह सफेद और उस पर हल्का काला धब्बा, धब्बेदार पीला! ऐसी रंग बिरंगी छोटी-छोटी चिड़ियां, जो अक्सर चिड़ियाघरों में भी देखने को नहीं मिलतीं। लेकिन, आप इन्हें इन दिनों दीघा के बगीचों में देख सकते हैं। जो लोग दीघा के बगीचा में घर बनाकर रह रहे हैं, वे इन चिड़ियों को देखते हैं, देख सकते हैं। ज्ञात हो कि प्रसिद्ध दीघा बगीचा से पेड़ काटने पर लगे प्रतिबंध के बावजूद यहां धड़ल्ले से बगीचा का सफाया किया जा रहा है और नित्य नये-नये घर बन रहे हैं। अगर यह हाल रहा तो न सिर्फ लोग दीघा के मालदह आम के लिए एक दिन तरस जायेंगे, बल्कि रंग बिरंगी चिड़ियों का आश्रय स्थल भी खत्म हो जायेगा।
सुबह उठते ही रंग-बिरंगी चिड़ियों की कलरव और उनके दर्षन। मजे की बात यह कि जितनी चिड़ियों की किस्में, उतनी ही आवाज। अपने आप में एक संपूर्ण संगीत जो सुबह-सुबह किसी के दिल को जीतने और मन को स्वच्छ करने के लिए काफी है। चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ लोग इन चिड़ियों को पकड़ने की कोषिष चोरी छिपे कर रहे हैं। ऐसे में इनका प्राकृतिक निवास प्रभावित होता जा रहा है।
बहरहाल रंग-बिरंगी चिड़ियों की दुनिया की ओर अभी ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया है। जिन लोगों को इन चिड़ियों ने अपनी ओर आकृष्ट किया है, उनमें से कुछ से खतरा अवष्य उत्पन्न हो गया है। तेजी से काटे जा रहे वृक्ष और पास ही स्थित औद्योगिक क्षेत्र से फैलते प्रदूृष्ण से इस प्रसिद्ध आम बगीचा पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अगर समय रहते इसपर ध्यान दिया गया, तो न सिर्फ दीघा का मालदह आम सदियों तक लोगों को मिलता रहेगा, बल्कि परीलोक सी दुनिया भी आबाद रहेगी। वैसे इन चिड़ियों की रह-रह कर आती आवाज जैसे अभी से ही लोगों को निमंत्रण दे रही हो। रसीले आम खानेे का।

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