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नीरज की जिद

प्रतिभा इंदु

नीरज अपने माता-पिता का इकलौता पुत्र था। अतः उसका पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हो रहा था। दो वर्ष की उम्र से ही जब उसने मम्मी-पापा कहना शुरु किया, तभी से उसमें विलक्षणता नजर आने लगी थी। हर नई चीज को वह जानने के लिए आतुर होता। मौका मिलता तो जलते हुए दीपक को छूने के लिए बढ़ता, मगर उसकी माँ उसे दूर हटा देती।
एक दिन उसकी माँ किचन में खाना बना रही थी और वह दूर कमरे में खेल रहा था। जलते हुए दीपक को देखकर वह उसकी ओर लपका, तो उसके छूने से दिया जमीन पर गिर गया। आवाज सुनकर उसकी माँ दौड़ती हुई कमरे में आई, तो देखा कि आग लगने ही वाली है, तभी किसी तरह अनहोनी घटना से बचा लिया। डाँट-डपटकर नीरज को धमकाया और समझाया, तो उसने फिर कभी ऐसी गलती नहीं की।
नीरज दिन-ब-दिन बड़ा होता गया। शाम को जब उसके पापा दफ्तर से घर लौटते, तो वह बाहर घुमाने के लिए जिद करता। न ले जाते, तो गोद से उतरकर जमीन पर लेट जाता और रोने लगता। उसकी जिद देखकर उसके पापा को उसे उठाकर बाहर ले जाना पड़ता। आती-जाती हुई मोटरें देखता, तो पूछने लगता, ‘‘पापा ! ये कहाँ रहती हैं ? कैसे चलती हैं ?’’ या फिर उड़ती हुई चिड़ियों को देखता तो पूछने लगता, ‘‘पापा ये इतना ऊपर कैसे उड़ जाती है ?’’ पापा बताते, ‘‘बेटा ! इनके पंख होते हंै, पंखों के सहारे ये आसमान में बहुत ऊँचे उड़ जाते हैं।’’
‘‘पापा ये कहाँ जाती हैं ?’’
‘‘घूमने, अपने बच्चों के लिए दाना लाने।’’
‘‘कहाँ से लाती हैं ?’’
‘‘खेतों, मैदानों से।’’
‘‘खेत, कहाँ होते हंै ?’’
‘‘क्या करोगे सब जानकर, बड़े होगे तो स्वयं जान जाओगे।’’
‘‘नहीं नहीं … मुझे बताओ, नहीं बताओंगे तो मैं … वहीं जाऊँगा आपके साथ।‘‘ और इतना कहते-कहते नीरज पापा की गोद से नीचे खिसकने लगता। यह देखकर उसके पिता को गुस्सा भी आता, पर इतने छोटे से बच्चे को कैसे समझाते। पास की किसी दुकान से टाॅफी या बिस्किट खरीदकर उसे पकड़ाते और समझाते हुए कहते, ‘‘चलो घर चलंे, चलकर चाय पीते हैं। मम्मी इंतजार कर रही होंगी।’’
वह और घूमने के लिए मचलता। किसी न किसी तरह नीरज को उसके पापा मना कर घर लाते और उसकी मम्मी से कहते, ‘‘देखो जी, तुम्हारा लाड़ला बहुत परेशान करने लगा है। कहीं फुरसत में तुम भी घुमा लिया करो।’’
‘‘मैं कहाँ जाऊँ लेकर, दिन भर के बाद आपको पाता है, इसलिए आपसे इतना मचलता है।’’ उसकी मम्मी ने कहा।
‘‘मचलता है वह तो ठीक है, लेकिन जो चीज देखता है उसी के बारे में पूरा इतिहास पूछने लगता है। किसी तरह कहानी सुनाने के बहाने लौटकर घर आने के लिए तैयार हुआ है, वरना वह सड़क पर लोटने जा रहा था।’’
‘‘तो ठीक है, राजा बेटा को कहानी सुना दो ना ! मैं चाय लेकर आई। आप कहानी सुनाइए।’’
‘‘क्यों बेटा, कहानी सुनोगे ?’’
‘‘हाँ पापा, कहानी सुनाओ।’’
उसके पापा ने कहानी शुरू की, ‘‘एक गोरैया थी। परिवार के साथ एक छप्पर में घोसला बनाकर रहती थी।’’
‘‘पापा ! जैसे हम अपने घर में रहते हैं।’’
‘‘हाँ बेटा! बिल्कुल इसी तरह, पर कहानी सुनो, बोलो नहीं, सब कुछ बताऊँगा कि वह खाना कहाँ से लाती थी, क्या हुआ ?’’
‘‘अच्छा।’’
‘‘तो घोंसला बनाकर गोरैया रहती थी। साथ में उसके दो बच्चे तथा उसका पति गोरा भी था। दिन होते दोनों पति-पत्नी बच्चों के लिए खाना लाने दूर खेतों की ओर उड़ जाते और घंटा-दो घंटा बाद कभी दाना कभी छोटे-छोटे कीड़े मकोड़े लेकर लौटते, तो बच्चे उन्हें देखकर चीं-चीं-चीं चिल्लाने लगते। मुँह मंे दाना और कीड़े डालकर गौरा और गौरेया फिर दूर निकल जाते।
एक दिन इसी तरह से दोनों दाना चुगकर जब खेतों की ओर उड़ गए, तो एक मोटा चूहा शरारत करने के लिए छप्पर पर चढ़ गया। वह छिपा हुआ गौरा-गौरेया को घोसले से निकलते हुए देख रहा था। बड़ी देर से इसी प्रतीक्षा में था कि कब दोनों जाएँ और वह गौरेया के बच्चों को परेशान कर उसका घोंसला कुतर-कुतर कर काटे।’’
‘‘फिर क्या हुआ पापा ?’’ जिज्ञासु नीरज बीच में बोल पड़ा, ‘‘चूहे ने बच्चों को मार डाला।’’
‘‘नहीं बेटा, जैसे ही उछलकर वह घोंसले की ओर लपका, तो उसका पैर फिसल गया, लेकिन फिसलते ही उसके पैरों के नाखून घोंसले में उलझ गए। घास-फूस से बना घोंसला नुचता हुआ नीेचे गिरा, तो चूहा भी साथ-साथ नीचे चला आया। गोरैया के बच्चे चीं-चीं-चीं कर के चिल्लाने लगे। तभी बच्चों के चिचियाने की आवाज सुनकर बिल्ली मौसी उधर दौड़कर आ गई। उसने सोचा, शायद कोई बच्चा नीचे गिर गया है। इसीलिए हँसती हुई आई कि आज अच्छा मौका मिला है, गोरैया से बदला लेने का। उस दिन मैं गिलास में रखा दूध पीने जा रही थी, तो गोरैया चीं-चीं-चीं कर के घर की मालकिन को बुला लिया था, यही सोचते जब वह वहाँ पहुँची तो देखा, चूहा घायल पड़ा कराह रहा है। चूहे को देखकर बिल्ली खिखियाती हुई दौड़ी और चूहे को मुँह में दबाएँ सीढ़ियों से छत पर चढ़ गई। कहाँ तो चूहा परेशान करने की नियति से गोरैया का घांेसला कुतरने चला था और कहाँ खुद ही बिल्ली का भोजन बन गया।
थोड़ी देर बाद गोरैया और गौरा अपनी-अपनी चोंचों में बच्चों के लिए खाना लेकर लौटे, तो देखा उनका घर उलझा हुआ पड़ा है, पर सुरक्षित बच्चों को देखकर वे फूले न समाए। बच्चे चीं-चीं-चीं कर अपने मुँह को खोला और गौरेया तथा गौरा ने उनके मुँह में खाना खिला दिया। बाद में दोनों उड़कर इधर-उधर से खरपतवार ले आए और अपने घोंसले को फिर उसी तरह मजबूत बना लिया।’’
‘‘पापा-पापा, गौरैया को जाड़ा नहीं लगता, हम लोग तो इतने कपड़े पहनते हैं, फिर भी ठंडी लगती है।’’
‘‘नहीं बेटा ! इनका घर इस तरह का बना होता है कि इन्हें जाड़ा नहीं लगता, फिर जिस तरह का जो है, उसको उसी तरह भगवान रखते भी हैं। देखो ना। चूहे ने जैसा किया, वैसा उसको फल मिला, तुम बच्चों को भी दूसरे का अहित नहीं सोचना चाहिए।’’
‘‘हाँ पापा, आप सही कह रहे है।’’ नीरज बोला।
तभी मम्मी चाय लेकर आ गई और सब चाय पीने लगे।

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