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नोटबंदी

राजीव मणि

अचानक पूरे देश में पांच सौ और एक हजार के नोट बंद कर दिये गये। सरकार का कहना था कि कालाधन खत्म करने और आतंकियों को हो रही फंडिंग को रोकने के लिए यह कठोर कदम उठाया गया है। पूरे देश में हड़कंप मच गया। लोग अपने पांच सौ और एक हजार के नोटों को बदलवाने के लिए बैंकों की लंबी-लंबी कतार में दिखने लगे।

सुबह के दस बज रहे थे। अभी घर से निकला ही था कि मगन शर्मा मिल गये। शर्मा जी मेरे मुहल्ले में ही रहते हैं। मुहल्ले के सबसे रईस आदमी हैं। रंगीन मिजाजी और बिंदास जिन्दगी के कारण पूरे मुहल्ले में चर्चित हैं। उम्र यही कोई पचपन साल होगी। लंबा-चैड़ा कद-काठी, गोरा रंग और स्वस्थ शरीर। पैसा तो इतना कि इन्हें भी नहीं मालूम कि कितना जमा कर रखा है। कभी चरचा होती भी है, तो कहते हैं, ‘‘बस ईश्वर का दिया काफी कुछ है।’’ सुबह-शाम एक किलो गाय का दूध और दो अंडा पेल लेते हैं। इसके बाद भी कहते हैं कि आजकल खाने में काफी परहेज कर रखा है। स्वस्थ रहने के लिए यह सब करना ही पड़ता है। लेकिन आज उनका चेहरा कुछ उतरा हुआ था। देखकर लगता था, जैसे मरनी से आ रहे हों! जब नजर मिल गयी, तो हालचाल पूछना फरज बनता था। सो, पूछना पड़ा – ‘‘कैसे हैं शर्मा जी?’’
शर्मा जी कुछ बोल नहीं पा रहे थे। कोशिश की, कुछ मुस्कराने-सा मुंह बनाया, लेकिन ना चेहरा साथ देता था, ना गले से आवाज निकलती थी। थोड़ा जोर लगाया, नकली दांत जगह से घसककर थोड़ा आगे को आ गया। आज पहली बार शर्मा जी को मैं बेबस देख रहा था। खुद को संभालते हुए बोले, ‘‘ठीक हूं, घुमने निकला था।’’
‘‘थोड़े चिन्तित दिख रहे हैं?’’ उनकी स्थिति देख यूं ही पूछ लिया।
‘‘नहीं …. नहीं, ऐसी बात नहीं है। हम काहे को चिन्तित हों, कौन सा हमारे पास खजाना पड़ा है। चिन्ता तो वे करें, जिन्होंने घर को गोदाम बना रखा है।’’ शर्मा जी ने सफाई दी।
‘‘अरे हां, यह तो गजब हो गया। अचानक ही पांच सौ और एक हजार के नोट बंद कर दिये गये। ….’’ मैं बोल ही रहा था कि फखटुआ आ गया। एक नंबर का दारूबाज! मजदूरी करता है। जितना कमाता है, शाम होते-होते सफा चट! फखटुआ के जीवन में कभी वसंत आता ही नहीं, पूरा साल सूखा! अक्सर किसी ना किसी के दरवाजे हाथ फैलाये पहुंच जाता है। पैर पकड़कर रोने लगता है, ‘‘कुछ उधारी दे दो बाबू, घरवाली बहुत बीमार है।’’ सभी जानते हैं उसकी लीला। फिर भी दस-बीस दे ही देते हैं। खास बात यह कि मगन शर्मा से काफी डरता है। इन्हें देखते ही अपना रास्ता बदल लेता है। लेकिन, आज फखटुआ हंसता हुआ सीना ताने आ धमका – ‘‘प्रणाम भैया!’’ उसके चेहरे पर आज चमक थी।
‘‘प्रणाम, कहो कैसे हो? बहुत खुश दिख रहे हो, कोई लाॅटरी लग गयी क्या?’’ मैं भी उत्सुकतावश पूछ बैठा। शर्मा जी भी साथ ही थे।
फखटुआ जोश में आ गया, ‘‘भैया के आशीर्वाद से लाॅटरी ही लग गयी। सरकार का भला हो, ओकर मेहरारू-बच्चा के भगवान भला करे। इऽ नोटबंदी से तो सचमुच खजाना हाथ लगा है। काऽ बताएं भैया, हमर मेहरारू हमरे पइसवा चोरा-चोरा के जमा कइले थी। पांच सौवा और हजरकी! पूरे एक लाख रुपया निकाल लायी और कहने लगी कि बैंक में जमा करा दो। इऽ मेहरारू जात के तो भगवानो ना समझ पाये, हम का समझेंगे।’’ शर्मा जी अंदर ही अंदर खौल रहे थे। फखटुआ खुशी से पागल हुआ जा रहा था। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मुझे ही उसे रोकना पड़ा। बहाना बना फखटुआ को चलता किया। इधर शर्मा जी बिना कुछ बोले अपनी राह पकड़ लिए।
खैर, मैं भी आगे बढ़ गया। बाजार पहुंचा, तो पता चला कि जन धन खाताधारकों की चांदी हो गयी है। एक बालू माफिया ने सबके खाते में पचास-पचास हजार रुपया जमा करवा दिया है। जमा करवाने से पहले यह शर्त रखी थी कि बाद में उसमें से पैंतालीस हजार रुपए वापस करने होंगे। सारे गरीब खुश थे। कोई कचैड़ी-जलेबी खा रहा था, कोई रसगुल्ला। बेचन महतो भी सामने से पान चबाता हुआ आ रहा था। कमीज पर पान के कुछ ताजा दाग बता रहे थे कि आज पहली बार पान खाया है। उधर मंगरूआ की पत्नी पांच सौ का नोट लिये एक दुकान पर पहुंच गयी, ‘‘पांच किलो चावल दे दीजिए।’’ दुकानदार से चावल लेकर पांच सौ का नोट थमा दी। दुकानदार भड़क गया, ‘‘अब यह नोट नहीं चल रहा है जी! पता है या नहीं।’’
‘‘लेकिन यही है हमारे पास। इसबार चला दीजिए ना।’’ दुकानदार कुछ सोचकर बोला, ‘‘पांच सौ के बदले चार सौ में चलेगा, मंजूर है तो बोलो।’’ मंगरूआ की पत्नी तुरन्त मान गयी।
उधर हल्ला हुआ कि गंगा नदी में एक बोरा हजरकी नोट फेंका हुआ है। यह सुनते ही कई उधर दौड़ पड़े। बाद में पता चला कि सारे नोट फाड़कर फेंके गए थे। खबर सुनकर पुलिस भी आ गयी। लोगों से पूछने लगी, ‘‘किसके हैं?’’ कोई नहीं बता रहा था। सभी भकुआए एक दूसरे का मुंह ताकते रहे।
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, नोटों से जुड़ी तरह-तरह की रंगबिरंगी खबरें भी आने लगीं। कचरे के ढेर पर नोटों के दर्शन होने लगें। नाले में इस नोट रूपी लक्ष्मी के विसर्जन भी! जिस धन्ना सेठ ने आजतक किसी भिखारी को एक चवन्नी तक नहीं दिया था, अब वे हजार रुपए की गड्डी बांट रहे थे। फूलन गोप का बेटा जुआ में हजार रुपए के पैकेट दांव पर लगा रहा था। दारोगा की बिटिया किलो से जेवर खरीद रही थी। नेता, ठेकेदार, वकील, डाॅक्टर, सभी बैंक से अपने रुपए बदलवाने में लगे थे। बैंक के अधिकारी अपना हिस्सा बनाने में! …. और आज डगरना के बेटा के हाथ में ना सिर्फ पांच सौ रुपए का नोट पहली बार आया था, बल्कि वह पूरा बंडल लेकर अपने दोस्तों संग ‘व्यापारी’ खेल रहा था। शौचालय, रसोईघर, पानी की टंकी, सब नोट उगल रहे थे। वाकई अब लगने लगा था – भारत पूरी दुनिया को खरीद सकता है।
एक तरफ जहां-तहां पुराने नोट उड़ रहे थे। दूसरी तरफ गरीब-गुरबा अपने-अपने नोट थामे बैंक की कतार में पूरा दिन गुजार रहे थे। इतनी भीड़ तो कभी चुनाव में वोट डालने को भी नहीं हुई थी! एटीएम हदस गये थे। परिणाम यह हुआ कि अधिकांश एटीएम पर ‘नो कैश’ का बोर्ड लटक रहा था। बैंकों की लाइन में मारामारी होने लगी। कइयों को नोट बदलवाने के चक्कर में मोक्ष की प्राप्ति हो गयी। यमराज का काम बढ़ गया!
पूरे देश में हंगामा मच गया। व्यापार चैपट। फैक्ट्रियों में काम नहीं। मजदूर अपने-अपने घर लौटने लगे। सरकार को कुछ सूझ नहीं रहा था। अब ना निगलते बनता था, ना उगलते! सो ‘प्लास्टिक मनी’ का प्रचार शुरू हुआ। चैनल-अखबार वाले कहने लगे, यह अच्छा है। विदेशों में तो काफी पहले से यह चलन में है। ना रुपए चोरी का डर, ना लूटे जाने का खतरा। इतने ‘बात बहादुरों’ के कहने पर मैं भी झांसे में आ गया। एक कार्ड बनवा लिया। बीस हजार रुपए भी डलवा लिए। सोचा, अब चिन्ता क्या है, चाय भी पियो तो कार्ड से भुगतान कर दो। और सिर्फ कार्ड लेकर दिल्ली चला गया। अगले दिन शाम को जब दिल्ली उतरा, काफी भूख लग चुकी थी। सोचा, किसी होटल में चलता हूं, डटकर शाही भोजन करूंगा और तब कुछ सोचा जायेगा।
एक महंगे होटल में घुस गया। ढेर सारा बढ़िया खाना आॅर्डर किया। डटकर खाया। और जब बिल चुकाने काउन्टर पर पहुंचा, तो शान से कार्ड निकालकर काउन्टर पर खड़ी मैम के आगे रख दिया। ‘‘कार्ड से भुगतान करना है। कितने का बिल है?’’
‘‘नौ सौ रुपए हुए। लेकिन, अभी कार्ड से भुगतान नहीं कर सकते। …. काम नहीं कर रहा है। कैश ही देने होंगे।’’
‘‘कैश नहीं हैं मैडम’’
‘‘तो थोड़ा इन्तजार कीजिए ….. ठीक होने तक।’’ इतना बोलकर मैडम अपनी कुरसी पर बैठ गयी। मैं बगल में खड़ा इन्तजार करता रहा। पूरे पांच घंटे बीत चुके! जो कोई आता, तिरछी नजर से मेरी ओर देखता। मैं बुरी तरह फंस चुका था। किसी तरह घंटों अपना मुंह हर आने-जाने वालों से छुपाता रहा। अंत में रात को अपना बिल चुका पाया और किसी तरह आफत टली।

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