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क्या नाम दूं

हरि प्रकाश गुप्ता

क्या नाम दूं
अपनी कविताओं का
लिखता हूं
और समझ नहीं पाता
और जो समझ जाता हूं
उसे, क्या नाम दूं
हां जी, मैं कविताएं लिखता हूं
तुम्हीं बताओ, क्या नाम दूं

गांव की याद आती है
तो गलियां और इमली के पेड़
के बारे में लिख लेता हूं
लिखते लिखते पाखट के पेड़ के
झूले की जिक्र भी छेड़ देता हूं
क्या नाम दूं
अपनी कविताओं का

वो तालाब जहां कमल डंडी और
सिंघाड़े चोरी चोरी खाते
दिन भर बिना बताये
घर से गायब
घरवाले ढ़ूंढ़ते ही रह जाते
शाम जब आती है ख्यालों में
वो मंदिर याद आ जाता है
जहां आरती और कीर्तन
आज भी गाया जाता है
क्या नाम दूं
अपनी कविताओं का

वो बचपन का खूबसूरत दोस्त
आंखों के सामने छा जाता है
जिसे ये दिल आज भी
ढूंढ़ता रह जाता है
चला जाता हूं, बचपन के
उन कारनामों में
छिप छिप कर बीड़ी का पीना,
ताश के पत्ते खेलना, लड़ाई-झगड़ा
और मस्ती करना
आप ही बताइये थोड़ा
गंभीर होकर समझाइये
क्या नाम दूं,
अपनी कविताओं का

वो पहाड़ जहां पतंगें उड़ाते
और कटी पतंगों का लूटना
स्कूल से आते ही
कंचों से खेलना
वो आम बाग… जहां आमों को
चोरी से तोड़ना और
पकड़े जाने पर
बाग के मालिक का
सिर फोड़ना
लिखा वही जाता है
जो दिल में आता है
क्या नाम दूं
अपनी कविताओं का।

पता : स्मृति नगर, भिलाई, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़़ पिनकोड-490020

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