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सकल कामनाओं की सिद्ध स्थली

राजीव मणि

शारदीय नवरात्र में देवी के सभी 108 पीठों में काफी बड़ा धार्मिक मेला लगता है। शक्ति पीठों में विन्ध्य पर्वत निवासनी विन्ध्यवासिनी देवी का महात्म्य सर्वोपरि है। पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही विन्ध्य पर्वत का भी जन्म हुआ, ऐसा बताया गया है। विन्ध्य पर्वत के बारे में एक कथा प्रचलित है कि एक बार विन्ध्य पर्वत ने सूर्य से कहा कि सुमेरू पर्वत की तरह वह उसकी परिक्रमा करे। पर सूर्य के असमर्थता प्रकट करने पर प्रबल महत्वाकांक्षी विन्ध्य पर्वत कुपित हो गया और सूर्य के मार्ग में रूकावट डालने के लिए उसने अपने आपको बढ़ाना शुरू कर दिया। सूर्य के मार्ग में बाधा पड़ने से देवता सहित साधारण मानव को काफी कष्ट होने लगा। तब सम्मिलित रूप में देवताओं और ऋषियों ने विन्ध्य पर्वत को समझाना चाहा, पर उनका कुछ भी समझाना बेकार गया। विन्ध्य पर्वत निरंतर अपने को बढ़ाता ही जा रहा था। अंत में निराश होकर सभी देवतागण विन्ध्य पर्वत के गुरू महर्षि अगस्त्य के पास गये और उनसे अपनी दर्द भरी दास्तां सुनायी। महर्षि अगस्त्य ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर विन्ध्य पर्वत को समझाने का विचार किया। एक दिन जब महर्षि अगस्त्य विन्ध्य पर्वत के पास पहुंचे, तो गुरू को आया देख विन्ध्य पर्वत ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। इससे पहले कि वह प्रणाम कर उठ पाता, महर्षि अगस्त्य बोल पड़े – जबतक मैं लौटकर न आऊं, मेरी प्रतीक्षा करो। मेरे लौट कर आने पर तुम अपनी इच्छानुसार बढ़ते रहना। तब से आज तक विन्ध्य पर्वत साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में सिर झुकाये पड़ा है।
मध्य से उतर-दक्षिण विन्ध्य पर्वत बिहार से लेकर मध्य प्रदेश होते हुए महाराष्ट्र तक फैला हुआ है। भौगोलिक दृष्टिकोण से विन्ध्य पर्वत का विस्तार पश्चिम से पूर्व की ओर 22 से 26 अक्षांश तक है। पर लगभग 16 किलोमीटर का क्षेत्र ही तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध है, जो गंगा के किनारे का क्षेत्र है। इस तपोभूमि का वर्णन वेदों एवं पुराणों में भी मिलता है। विन्ध्य पर्वत अनादि काल से अपनी विशेषता के कारण साधु-महात्माओं, देवताओं एवं ऋषियों का आराधनीय प्रेरणा स्त्रोत एवं सकल कामनाओं का सिद्ध केन्द्र रहा है। यहां ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, लक्ष्मी, पार्वती आदि अनेक देवी-देवताओं और ऋषियों ने तपस्या कर वांछित फल को प्राप्त किया है। इसी तपोभूमि पर मां विन्ध्यवासिनी का महाशक्तिपीठ अवस्थित है। हमारे देश में मुख्य रूप से हिन्दू धर्मों में पांच संप्रदायों की मान्यता है, जिनके अपने-अपने अनुयायी हैं।
इन पांचों संप्रदायों का अलग-अलग सिद्ध क्षेत्र प्रसिद्ध है। यहां हम प्रमुख रूप से शाक्त संप्रदाय से संबंधित सिद्ध क्षेत्र की चर्चा करेंगे। जैसा कि विदित है, इस संप्रदाय के मतावलम्बी शक्ति की उपासना करते हैं। सिद्धि एवं मनोकामना की पूर्ति हेतु देवी के विभिन्न शक्ति पीठों में नवरात्र के समय विधि विधान के साथ पूजा-अर्चन करते हैं। कहा जाता है कि मां पार्वती के बारे में जब भगवान शंकर को जानकारी हुई, तो वे अपने गणों के साथ वहां पहंुचे और यज्ञ विध्वंश कर डाला। पार्वती का शव कंधे पर लटकाये विन्ध्य में इधर-उधर घूमने लगें, जिससे विधि के विधान में अड़चन पैदा होने लगी। इनका ध्यान भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उस शव को काटना शुरू कर दिया। जहां-जहां ये अंग गिरें, वहीं पाषाण मूर्ति स्थापित कर दी गई। उसी पाषाण मूर्ति में मां जगदंबा ने शक्ति भर दी और मूर्ति हर प्रकार की कामनाओं की पूर्ति, मंत्रों और साधना को सिद्ध करने वाली बन गई। वही स्थान सिद्ध क्षेत्र शक्ति पीठ के रूप में पूजा जाने लगा। देवी भागवत के अनुसार ही मां जगदम्बा ‘पार्वती’ के अंगों एवं अलंकारों का पृथ्वी पर कुल 108 स्थानों पर गिरना बताया गया है। पर विशेष रूप में सिर्फ 51 स्थानों का ही वर्णन मिलता है। इनमें से 12 स्थान अति महत्वपूर्ण हैं। विन्ध्यवासिनी देवी का शक्ति पीठ उनमें से ही एक है। यद्यपि जिन 51 स्थानों पर देवी के अंगांे का गिरना बताया गया है, उनमें विन्ध्यवासिनी देवी का कोई जिक्र नहीं है, पर 108 पीठों में यह नाम आता है।
जहां-जहां भी शक्ति पीठ हैं, उन स्थानों पर भैरव सेनापति के रूप में देवी के पार्षद बन कर रहते हैं। ऐसा कोई भी शक्ति पीठ नहीं, जहां भैरव उपस्थित न हों। भैरव ही मां जगदम्बा के प्रहरी हैं। साधारणतः 52 भैरव की चर्चा मिलती है। इन 52 भैरवों में 51 तो मां जगदम्बा के 51 शक्ति पीठों में विराजमान हैं। 52वां भैरव मां विन्ध्यवासिनी के धाम में लाल भैरव के रुप में पूजे जाते हैं। यही नहीं, स्वयं दक्षिणमुखी हनुमान जी विन्ध्यवासिनी के द्वारपाल के रूप में विराजमान हैं। शाक्त संप्रदाय में विशेषतः अघोर, तांत्रिक, मंत्रविज्ञानी, वाममार्गी और दक्षिण पंथी आदि आते हैं। गिरे अंगों में कमर के ऊपर के भाग से दक्षिण पंथी मार्ग तथा कमर के नीचे के भाग से वाम मार्ग की उपासना का विधान है। पर अधिकांश लोग महालक्ष्मी की ही पूजा करते हैं।
विन्ध्यांचल में मां विन्ध्यवासिनी ‘पालनकर्ता’, महाकाली ‘संहारकर्ता’ और अष्टभुजा ‘सृजनकर्ता’ के मंदिर की स्थितियांे के कारण ही इसे एक ‘त्रिकोण’ की संज्ञा दी गई है। यहां प्रतिदिन चार बार देवी का श्रंृगार एवं आरती की जाती है। कहते हैं, चारों श्रृंगारों में देवी का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है। इसे एक आश्चर्य ही कहा जा सकता है।

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