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साहित्य सृजन में सोशल मीडिया की भूमिका

विजयानंद विजय

आज इंसान इस दुनिया में और कहीं हो या न हो, या होकर भी न हो, मगर सोशल मीडिया में जरूर मौजूद होता है। यह सोशल मीडिया हमारे समय, संसार और जीवन का एक अनिवार्य और अविभाज्य अंग बन चुका है। इस तकनीकी सुविधा ने फेसबुक, व्हाट्सएप्प, ब्लॉग आदि पर साहित्य सर्जना में भी बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आज ऐसे अनेकों फेसबुक व व्हाट्सएप्प समूह विद्यमान हैं, जहाँ उच्च कोटि की कविताएँ, गीत, नवगीत, गजल, व्यंग्य, कहानियां, लघुकथाएँ, ललित निबंध, आलेख रचे जा रहे हैं और उनका व्यापक प्रचार-प्रसार भी हो रहा है। पहले जब हम कुछ लिखते थे, तो उसमें अनुभव और मार्गदर्शन आधारित सुधार और परिमार्जन की संभावना कम होती थी, क्योंकि हम खुद लिखते थे और खुद ही उसे पढ़ते थे। रचनाओं के प्रकाशन के अवसर भी कम हुआ करते थे। रचनाएँ प्रकाशित नहीं हुईं, तो क्यों नहीं हुईं और उनमें क्या कमियाँ थीं, इसका पता नहीं चल पाता था। मगर आज सोशल मीडिया पर सक्रिय विभिन्न साहित्यिक समूहों ने रचनाकारों को एक स्वस्थ और सशक्त मंच प्रदान कर दिया है, जो नवोदितों को त्वरित रूप से अपनी रचनाएँ प्रकाशित करने का अवसर और खुशी तो देता ही है, सुधी पाठकों, वरिष्ठों द्वारा वे पढ़ी-गुनी भी जाती हैं, उन पर चर्चा होती है, विमर्श होता है और अपेक्षित सुधार की सलाह दी जाती है। कई समूह विभिन्न विषयों, भावों, अनुभूतियों, चित्रों, प्रकरणों पर खुली प्रतियोगिता और परिचर्चा भी आयोजित करते हैं, जिसमें सीखने-सिखाने का एक स्वस्थ माहौल सृजित होता है। कल्पना-चिंतन-मनन की त्रिवेणी से सृजन-सरिता बहती रहती है। वरिष्ठों का दिशानिर्देश पाकर नवोदित निरंतर सीखते हैं, निखरते हैं और इससे रचना-संसार भी समृद्ध होता है। समय, समाज, परिवेश और राष्ट्र के प्रति हमारी चेतना और संवेदना भी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त-अभिव्यंजित होती है। इस तरह हम अपनी विरासत को सुरक्षित और संरक्षित कर पाते हैं। इन सोशल मीडिया समूहों ने ऐसे अनगिनत सितारे दिए हैं, जो आज साहित्याकाश में देदीप्यमान हैं। साहित्यिक सोशल मीडिया समूह कथ्य, शिल्प, शब्द विन्यास के स्तर पर प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण का कौशल विकसित करने का एक सकारात्मक मंच भी है।

सोशल मीडिया समूहों के कुछ नकारात्मक पक्ष भी हैं, जिन पर विशद चर्चा और विमर्श अपेक्षित है। सोशल मीडिया तकनीक ने हर हाथ में की-पैड देकर आज हर किसी को लेखक, कवि, गजलगो, कहानीकार, शायर, लघुकथाकार बना दिया है। चाहे भाषा-मात्रा-लिंग-वर्तनी की हजार गलतियां हों या रचनाकार की अपनी सीमाएं हों, मगर लिखा खूब जा रहा है। हिंदी-उर्दू के चार शब्द कहीं पढ़-सुन लिए या मिल गये और कुछ टूटा-फूटा निर्रथक-सा दो वाक्य भी बन गया, तो गजल हो गयी और खुशी से खुद ही ‘वाह-वाह’ कर बैठे, और झट से फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर पोस्ट कर दिया। भई, खुला मंच मिला है, तो उपयोग तो करेंगे ही न ? कहीं कोई घटना देख-सुन ली, तो कहानी रच दी, कथ्य, शिल्प, प्रस्तुतीकरण, प्रभावोत्पादकता, उपादेयता और सोद्देश्य संदेश-संप्रेषण की तो बात ही छोड़ दीजिए। कहीं किसी ने कोई मजाक कर दिया या हँसने वाली बात छेड़ दी, तो व्यंग्य लिख लिया, भले उसमें कटाक्ष या तंज हो या न हो। लिखना है, तो बस लिखना है। दोस्त-मित्र- शुभचिंतकों का ‘बधाई-बधाई’ का टॉनिक तो है ही, उत्साह के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाने के लिए।
लेखन में सुधार, परिमार्जन और परिष्करण तो तब होता है, जब रचना की आलोचना-समालोचना हो, उस पर विचार- विमर्श-चिंतन-मनन हो। मगर दिक्कत यह है कि ऐसे में आलोचना करने वाला या सलाह देने वाला व्यक्ति ही लेखक की नजरों में खलनायक बन जाता है। ऐसे अनपके-अधपके लेखन से रचनाकार खुश तो हो लेता है, पर ऐसी रचनाएँ यूँ ही आती हैं और नजरों से ओझल हो जाती हैं। यह साहित्य के क्षेत्र में सोशल मीडिया का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव है और इसने साहित्य का नुकसान ही किया है। कट-पेस्ट और रचनाएं चोरी कर अपने नाम से प्रकाशित करने के मामले भी बहुतायत से पाए जा रहे हैं। यह साहित्यिकता का नैतिक पतन है। इस प्रवृत्ति को रोकने के लिए कॉपीराइट कानून को और सख्त करना होगा।
बहरहाल, सोशल मीडिया ने इतना तो जरूर किया है कि कल्पनाशील रचनाकारों को अपने वरिष्ठों को पढ़ने, जानने, समझने का अवसर प्रदान किया है और श्रेष्ठतर रचने तथा उन्हें प्रचारित-प्रसारित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम और मंच उपलब्ध करा दिया है, जहाँ समाज का दिया हुआ, हम अपने अनुभव, अपनी भाषा, अपनी अभिव्यक्ति के माध्यम से, समाज को ही सकारात्मक रूप में लौटाकर समाज की बहुत-सी विषमताओं, विकृतियों को मिटाने में सहभागी बन सकते हैं। समाज की सोच, मानसिकता और चेतना को महान उद्देश्यों की पूर्ति की ओर ले जा सकते हैं।

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