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बिहार में ‘सेक्स बम’

राजीव मणि

रजनी पटना के एक अच्छे स्कूल में पढ़ती है। नौवीं की छात्रा है। महंगे मोबाइल रखना, घुमना-फिरना, नए-नए गैजेट खरीदना उसे बहुत पसंद है। साथ ही अपने ब्वाॅय फ्रेंड के साथ रेस्टोरेंटों में जाना भी उसे अच्छा लगता है।
एकदिन अचानक रजनी के पेट में तेज दर्ज हुआ। साथ ही एमसी भी। काफी खून निकलने से वह परेशान हो गयी। अपने घर में किसी को बताए बिना वह एक दवा दुकान पर पहुंची और दुकानदार से अपनी इस परेशानी को बता दवा मांगने लगी। दवा दुकानदार ने किसी डाॅक्टर से दिखा लेने की सलाह दी। वह रोने जैसी सूरत लिए वहां से चली गयी।
दरअसल यह किसी एक रजनी की कहानी नहीं है। हमारा समाज काफी तेजी से बदल रहा है। बिहार की लड़कियां कुछ ज्यादा ही!
ये बातें तब पता चलीं, जब पटना के एक दवा दुकानदार राहूल ने इस पत्रकार को सारी बातें बतायीं। राहूल के अनुसार, सिर्फ उसकी दुकान से 12 से 18 वर्ष की 20-25 लड़कियां प्रतिदिन गर्भ निरोधक दवा खरीदती हैं। लड़कियों द्वारा ज्यादातर आई-पील, अनवान्टेड और एमटीपी किट की मांग की जाती है।
राहुल बताते हैं कि लड़कियां अकेले ही दवा खरीदने आती हैं। वजह साफ है, किसी को पता न चले। इन लड़कियों में सरकारी स्कूल से लेकर पब्लिक स्कूल तक की लड़कियां होती हैं। वे कहते हैं कि अब लड़कियां ही ज्यादा लड़कों को उकसाती हैं। इसके प्रमाण में वे बताते हैं कि लड़कियां न सिर्फ अपने लिए गर्भ निरोधक दवा खरीदकर ले जा रही हैं, बल्कि लड़कों के लिए कांडोम और उत्तेजित करने वाली दवाएं भी। इनमें विभिन्न कंपनियों के कांडोम और मैनफोर्स व विजोरा जैसी उत्तेजना वाली दवाएं भी हैं।
ये सारी बातें किसी भी सभ्य समाज को विचलित कर सकती हैं। इस पत्रकार द्वारा मामले के और तह तक पहुंचने के लिए छानबीन की गयी। कई अन्य दवा दुकानदारों से भी बात की गयी।
पता चला कि करीब-करीब सभी दवा दुकानों से कम उम्र लड़कियां धड़ल्ले से ऐसी दवाएं खरीद रही हैं। हां, आंकड़े कहीं कम तो कहीं ज्यादा अवश्य हैं।

छानबीन में पता चला कि सिर्फ पटना में हजारों कम उम्र लड़कियां प्रतिमाह गर्भ निरोधक दवाएं, वियाग्रा और कांडोम खरीदती हैं। इनमें वैसी लड़कियां भी काफी संख्या में हैं, जो सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं और काफी गरीब घर की हैं। यह भी पता चला कि मौज-मस्ती और सेक्स की भूख मिटाने का खेल यहां बड़ी संख्या में हो रहा है। लड़कों के पैसे पर ऐश करती ये लड़कियां जाने-अंजाने में काॅल गर्ल तक बन जा रही हैं। इसके कई प्रमाण यहां मिले हैं।
पटना में फरवरी माह में रेस्टोरेंटों पर मारे गये छापे में यह खुलासा हुआ था कि रेस्टोरेंटों में बने केबिनों में धड़ल्ले से जिस्म का खेल चल रहा है। इनके अधिकांश ग्राहक स्कूल-काॅलेज के छात्र-छात्राएं व प्रेमी जोड़े होते हैं। साथ ही जो युवक यहां अकेले आता है, उससे मोटी रकम लेकर कम उम्र लड़कियां सप्लाई की जाती हैं। इन सारे खेल में थाना के अधिकारी भी मिले होते हैं। दूसरी तरफ पिछले दिनों कई जेंट्स व ब्यूटी पार्लरों पर छापे मारे गये। यहां भी छापा दल को ऐसे ही सबूत मिले हैं।
स्कूल, काॅलेज और कोचिंग के बहाने कम उम्र लड़कियों के सेक्स का खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। मामले के और तह तक जाने के लिए कुछ पीसीओ संचालकों से भी बात की गयी। पटना के एक पीसीओ मालिक रोहन ने कुछ यूं खुलासा किया।
रोहन के अनुसार, उनकी दुकान पर छह लड़कियां ऐसी आती हैं, जो अपने मोबाइल में प्रतिदिन 40-50 रुपए का बैलेंस डलवाती हैं। साथ ही पीसीओ के फोन से काफी देर तक किसी लड़के से बात करती हैं। रोहन कहते हैं कि कोई स्कूली छात्रा प्रतिदिन 40-50 रुपए मोबाइल पर खर्च कर कहां बात कर सकती है।
रोहन की दुकान पर प्रतिदिन आने वाली सभी छह लड़कियों की उम्र 13 साल से लेकर 18 साल तक है। ज्ञात हो कि इस पत्रकार द्वारा अपनी जांच का दायरा 18 साल से कम उम्र की लड़कियों तक ही रखा गया है।
यह भी पता चला कि इन छह में से चार लड़कियां जो पीसीओ के फोन से बात करती हैं, उसकी बातों से लगता है कि अलग-अलग लड़कों के साथ इनका शारीरिक संबंध रहा है। कई बार तो ये लड़कों के सामने फोन पर ही गिरगिराती हुई दिखती हैं।
रोहन बताते हैं कि पब्लिक स्कूल की लड़कियां अपने स्कूल टाइम में कम ही आती हैं। हां, सरकारी स्कूल की लड़कियां स्कूल टाइम में भी आ जाती हैं। वैसे कोचिंग का समय दोनों स्कूल की लड़कियों के लिए ‘गोल्डन टाइम’ होता है। घर से तरह-तरह के बहाने बनाकर बाहर सेक्स का खेल खेला जा रहा है। रोहन के अनुसार, एक-दो बार तो काफी बड़े घर की स्कूली छात्रा ने पीसीओ के फोन से किसी लड़के से जो बाते कीं, उसे तो वह बयान भी नहीं कर सकता।
इसी विषय पर नन्द कुमार प्रसाद से बात की गयी। ये सामाजिक व धार्मिक विषयों के अच्छे जानकार हैं। नन्दजी कहते हैं, समाज आज ‘सेक्स बम’ बन चुका है। अब इसे रोक पाना काफी कठिन दिखता है। अभिभावक, शिक्षक और समाज, सभी को इसपर गंभीरता से सोचना होगा। वैसे टीवी चैनलों व विज्ञापनों का असर साफ दिखने लगा है। इस बाजारवाद में सबकुछ चलता है, जैसी स्थिति हो गयी है। बिहार इससे काफी ज्यादा प्रभावित है।

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