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शहतूत का पेड़

अनिता तोमर ‘अनुपमा’

‘‘पागल कहीं का।’’ इला जोर से चिल्लाते हुए बोली, ‘‘कितनी बार तुझे कहा है कि मेरी किताबों को मत छुआ कर।’’
गणेश ने पलटकर इला के चेहरे की ओर देखा और फिर जीभ उसे चिढ़ाते हुए बोला —
‘‘इल्ली-इल्ली, माचिस की तीली,
बिना दुम वाली काली बिल्ली।’’
इससे पहले कि इला कुछ कहती, गणेश वहाँ से भाग खड़ा हुआ। यह कोई नई बात नहीं थी। इला और गणेश अकसर इसी तरह आपस में झगड़ते रहते थे। दोनों इस बड़ी-सी कोठी में बने सर्वेंट क्वार्टर में रहते थे। इला के पिता यहाँ चैकीदार थे और गणेश के पिता खानसामा। दोनों बच्चे पास ही के सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। इला छठी कक्षा में थी और गणेश चैथी में। इस विशाल कोठी में केवल उन दोनों के ही परिवार रहते थे। गणेश के सिवा इला की हमउम्र का कोई भी बच्चा नहीं था, जिसके साथ खेल वह सके।
कोठी बड़ी जरूर थी, परंतु नौकरों के बच्चों को केवल पीछे बने हुए भाग में ही रहने की अनुमति थी। यहाँ तक कि बाहर भी पिछले गेट से ही आया-जाया जा सकता था। कोठी में जब भी कोई पार्टी होती, दोनों के मजे आ जाते। गणेश के पिता केक, बादाम-पिस्ते का हलवा, पनीर, पुलाव, पूड़ी-सब्जी न जाने कौन-कौन से पकवान चुपके-से निकालकर घर तक पहुँचा देते। दोनों बच्चे चुपचाप सबसे ऊपर वाली छत पर ले जाकर पार्टी का आनंद उठाते।
जब कभी कोठी का मालिक अपने परिवार के साथ महीने-भर के लिए बाहर जाता, तब दोनों आजाद पंछी की भाँति पूरी कोठी में बेधड़क घूमते। लॉन में रखे झूले पर खूब झूलते। ऐसा लगता, मानो ये कोठी उन्हीं की है। परंतु जब गणेश अपने दादा-दादी के गाँव जाता, तब इला बिलकुल अकेली पड़ जाती।
इतने में गणेश पीछे-से आकर इला के कान में जोर से ‘हू’ कहकर चिल्लाता है। इससे पहले इला उसे कुछ कहती, वह इला को मनाने के अंदाज में बोला, ‘‘चल नारंगी तोड़ने चलते है।’’
इला ने सिर हिलाकर मना करते हुए कहा, ‘‘नारंगी खट्टी हैं, मुझे नहीं खानी।’’
गणेश कुछ सोचने लगा, फिर बोला, ‘‘चल शहतूत तोड़ने चलते हैं। बगल-वाली कोठी में शहतूत के पेड़ पर बड़े-ही मीठे, काले और लंबे शहतूत लगे हैं।’’
इला ने आँखें दिखाकर कहा, ‘‘पागल है क्या ! तुझे पता है ना, उस कोठी के चैकीदार की एकबार बाबा से लड़ाई हो चुकी है, वो हमें घुसने भी नहीं देगा।’’
गणेश ने कहा, ‘‘तू चिंता मत कर, हम लोग सामने के गेट से नहीं जाएँगे, बल्कि अपनी कोठी के पीछे वाली दीवार को फाँदकर पिछली तरफ से जाएँगे।’’
इला बोली, ‘‘नहीं… नहीं बाबा… मुझे डर लगता है, अगर माँ को पता चला, तो बहुत मार पड़ेगी।’’
गणेश ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘किसी को पता भी नहीं चलेगा, वैसे भी तुम्हारी माँ दोपहर में सो जाती हैं। तुम्हें पता है ! उस पेड़ के शहतूत बड़े ही काले, रसीले और मीठे हैं और सबसे बड़ी बात दोपहर के समय उस कोठी में कोई भी नहीं रहता।’’
शहतूत की मिठास मानो इला को अपनी ओर खींच रही थी। वह चाहकर भी शहतूत खाने के मोह से खुद को छुड़ा नहीं पा रही थी। दोपहर को माँ के सोते ही दबे-पाँव कमरे से निकलकर वह गणेश के पीछे चल पड़ी।
गणेश ने एक टूटी हुई कुरसी दीवार के किनारे रखी और सीमेंट की जाली के सहारे चारदीवारी पर चढ़ गया। दीवार ज्यादा ऊँची नहीं थी। फिर उसने हाथ के सहारे से इला की दीवार पर चढ़ने में मदद की। दोनों कूदकर कोठी के पिछले भाग में दाखिल हुए। शहतूत के पेड़ के नीचे पहुँचे, तो देखा वहाँ ढेर सारे शहतूत गिरे पड़े थे, परंतु उनमें से अधिकतर गले हुए थे। जो थोड़े बहुत अच्छे थे, वे मिट्टी में सने हुए थे।
गणेश ने इला की ओर देखा। उसके चेहरे पर गुस्से के भाव उभर रहे थे। इससे पहले कि वह कुछ कहती, गणेश बोला, ‘‘रुक तो सही, कुछ और सोचता हूँ।’’
शहतूत का पेड़ बहुत बड़ा और घना था। उस पर चढ़ना भी आसान नहीं था। गणेश ने ऊपर की ओर निगाहें घुमाई। अचानक उसकी आँखें चमकने लगी। वह कोठी के पिछले भाग में बने सर्वेंटस क्वार्टर की सीढ़ियों की ओर तेजी से बढ़ने लगा। इला की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। वह बड़बड़ाती हुई गणेश के पीछे चल दी।
दोनों सीढ़ियों से कोठी की छत तक पहुंच गए। छत पर शहतूत का पेड़ लंबे, काले और रसीले शहतूतों से लदा हुआ मानों अपनी बाँहें फैलाए उन दोनों का ही इंतजार कर रहा था। इला की छोटी-छोटी आँखें इतने सारे शहतूत देखकर चमक उठी। दोनों शहतूत तोड़-तोड़कर खाने लगे। इला ने ढेर सारे शहतूत तोड़ लिए। उसके दोनों हाथ शहतूत से भर गए।
वह गणेश से बोली, ‘‘इन्हें घर कैसे लेकर जाएँगे। अगर एक पन्नी मिल जाए, तो हम बहुत सारे शहतूत तोड़कर ले जा सकते हैं।’’
दोनों छत पर ढूँढ़ने लगते है, परंतु उन्हें कोई पन्नी नहीं मिलती। छत के एक ओर एक कमरा बना हुआ था। गणेश की नजर उस पर पड़ती है। कमरे के दरवाजे पर ताला नहीं लगा था, केवल बाहर से कुंडी बंद थी। गणेश ने डरते-डरते कुंडी खोलने की कोशिश की।
इला दोनों हाथों में शहतूत थामे डरते हुए बोली, ‘‘घर चलते हैं, मुझे डर लग रहा है, अगर किसी ने देख लिया, तो बहुत मार पड़ेगी।’’
इतने में दरवाजे पर लगी कुंडी खुल जाती है। दोनों कमरे में दाखिल होते हैं। कमरा बिलकुल खाली था। जमीन पर केवल एक बिस्तर बिछा हुआ था। मेज पर पानी की बोतल और एक गिलास रखा था। एक छोटी अलमारी कोने में रखी हुई थी। दोनों ने पन्नी ढूँढने की कोशिश की, परंतु कहीं नहीं मिली।
अचानक गणेश की नजर उस कमरे में ही एक दरवाजे पर पड़ी। जैसे ही उसने दरवाजा खोला, उसकी नजर बिस्तर पर लेटी हुई एक वृद्धा पर पड़ी। सूखी हड्डियों के ढाँचे-सा उसका शरीर बहुत ही डरावना लग रहा था। दरवाजा खुलने की आवाज सुनते ही उसने अपनी गरदन उठाकर उस ओर देखने की कोशिश की। उसकी अंदर तक धँसी आँखों को देखकर इला डर के मारे गणेश के पीछे छिप गई।
बुढ़िया ने धीमी आवाज में पूछा, ‘‘कौन हो तुम ?’’
गणेश ने हकलाते हुए कहा, ‘‘म… म… माफ कर दीजिए। वो… वो हम आपके बगलवाली कोठी के सर्वेंट क्वार्टर में रहते हैं। हम यहां शहतूत तोड़ने आए थे।’’
बुढ़िया ने दोनों को ऊपर से नीचे तक निहारा। फिर उसकी नजर इला के हाथों पर टिक गई। बुढ़िया की आँखें चमक उठीं। उसने धीमी आवाज में पूछा, ‘‘क्या ! पेड़ पर शहतूत लगे हैं।’’ उत्तर में गणेश ने केवल सिर हिला दिया।
बुढ़िया बोली, ‘‘इस पेड़ के साथ बड़ी ही गहरी यादें जुड़ी हैं। इसे मैंने अपने मायके से लाकर अपने हाथों से यहां लगाया था। पिछले कुछ सालों से मैं बिस्तर पर ही पड़ी हूँ। इस कमरे से बाहर तक नहीं निकली। मेरे बच्चों के पास मेरे लिए समय ही नहीं है। एक नौकरानी मेरे लिए रख छोड़ी है। मेरी आँखें इसे देखने के लिए तरस गईं। मरने से पहले एक बार बाहर जाकर इसे देखना चाहती हूँ।’’
बुढ़िया कुछ देर के लिए चुप हो गई। गणेश ने इला की ओर देखा। इला ने आँखों के इशारे से उसे चलने के लिए कहा। इतने में उनके कानों में बुढ़िया के धीमे स्वर सुनाई पड़े – ‘‘क्या तुम दोनों मुझे शहतूत का पेड़ दिखा सकते हो ?’’ यह सुनते ही दोनों असमंजस में पड़ गए।
बुढ़िया की कातर आँखों में से आँसू बहने लगे। इला की नजर बुढ़िया की नजर से मिली। उसे उन आँखों में बेचारगी नजर आईं। गणेश कुछ सोच ही रहा था कि अचानक उसकी नजर पास रखी आरामकुर्सी पर पड़ी। दोनों ने सहारा देकर बुढ़िया को उस कुर्सी पर तकिए के सहारे से बिठा दिया। फिर दोनों कुर्सी को घसीटते हुए बाहर तक ले आए। बाहर अभी धूप थी। रोशनी के कारण बुढ़िया की आँखें चैंधिया गईं। काफी देर बाद धीरे- धीरे उसने अपनी आँखें खोलने की कोशिश की।
शहतूत के पेड़ को देखकर उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। गणेश और इला समझ नहीं पा रहे थे। काफी देर बुढ़िया चुपचाप उस पेड़ को निहारती रही। इला ने डरते-डरते पूछा, ‘‘दादी ! क्या हम अपने घर चले जाएँ ?’’
बुढ़िया की आँखों में ढेर सारा प्यार छलक रहा था। मुस्कुराकर उन्होंने अपनी पलकें झपका दी। दोनों ने उन्हें वापस बिस्तर पर लिटा दिया। बुढ़िया ने उन्हें ढेरों आशीष दिए और बोली, ‘‘अब तुम जाओ, मैं सोना चाहती हूँ।’’ दोनों बोझिल मन से वापस लौट आए।
अगले दिन जब दोनों स्कूल से लौटे, तो देखा कि पास की कोठी में बड़ी चहल-पहल थी। उन्हें लगा शायद कोई पार्टी है। अकसर ही वहाँ पार्टियाँ होती रहती थी।
बाहर जूते निकालते हुए इला के कानों में माँ की आवाज सुनाई दी। माँ शायद किसी से बात कर रही थी।
‘‘चलो अच्छा ही हुआ, बेचारी बुढ़िया चली गई, वरना एक कमरे में पड़े-पड़े दुर्गति ही हो रही थी।’’
इला को अपने कानों पर बिलकुल भी विश्वास नहीं हो रहा था कि बूढ़ी दादी कल रात को गुजर गई। शायद उस शहतूत के पेड़ में ही उनके प्राण अटके थे। उसे देखकर वे शांति से गहरी नींद में सो गई।
कमरे में घुसते ही उसकी नजर कल के तोड़े हुए शहतूतों पर पड़ी, उसकी आँखों से अनायास ही आँसू बहने लगे।

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