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चिंताजनक है केरल का तालिबान कनेक्शन

रमेश शर्मा

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तालिबान के समर्थन को लेकर यूँ तो देश भर के विभिन्न प्रांतों से समाचार आये हैं, कहीं-कहीं कुछ गिरफ्तारियां की भी खबर आई, पर केरल से आने वाली तीनों खबरें बहुत गंभीर हैं। ये तीनों खबरें केवल चौंकाने वाली भर नहीं हैं, बल्कि पूरे देश को सतर्क करने वाली हैं। अर्ध निद्रा से जगाने वाली हैं कि स्वतंत्र भारत में किस तरह तालिबान मानसिकता गहरी हो रही है, अपना फैलाव कर रही है, जड़े मजबूत कर रही है। दुनिया के लिए भले तालिबान 27 साल पुराना नाम हो, पर यह मानसिकता नयी नहीं है, सैकड़ों साल पुरानी है। भारत इसे शताब्दियों से झेल रहा है।
देश की धरती का कण-कण रक्त रंजित है। लाखों प्राणों की आहुतियां हुईं हैं। भारत का विभाजन भी हुआ, पर भारत इस क्रूरता से मुक्त न हो पाया। यह वही केरल प्रांत है जहां भारत में ही भारतत्व को समाप्त करने का अभियान चल रहा है।
यदि हम पुराने संदर्भ को छोड़ भी दें तब भी पिछले सौ सालों का तो इतिहास साक्षी है, एक-एक घटना का विवरण है कि कैसे वहां के लोगों ने इस तालिबानी मानसिकता का क्रूर आतंक झेला है। समय बदला, लोग बदले, विषय बदले लेकिन मानसिकता की क्रूरता कभी न बदली। पर आश्चर्य इन तीनों समाचारों पर देश में जो प्रतिक्रिया आनी चाहिए थी, वह देखने सुनने को नहीं मिली। पहला समाचार इंडियन मुस्लिम लीग के विधायक एम.के. मुनीर को धमकी देने का है।
विधायक ने अपने फेसबुक अकाउन्ट पर अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम पर तालिबान का समर्थन नहीं किया था। इस पर विधायक को धमकी दी गयी और सोशल मीडिया से अपनी टिप्पणी हटाने के लिए कहा गया। दूसरी खबर आई कि केरल के 17 नौजवान इन दिनों अफगानिस्तान में तालिबान के लिए काम कर रहे हैं। इनमें 14 तो वे लोग हैं, जो आईएस आईएस के लिए काम करते हैं और इस समय तालिबान के साथ हैं। इन्हें अफगानिस्तान की पिछली सरकार ने बंदी भी बना लिया था, लेकिन अब तालिबान ने उन्हें जेल से रिहा कर दिया है। मीडिया में यह खबरें भी आईं कि 26 अगस्त को काबुल विमानतल के पास जो विस्फोट हुआ था उसके पीछे केरल के इन लोगों का भी हाथ रहा है। यह भी समाचार आया कि विस्फोट के प्रतिशोध के लिए अमेरिका ने जो ड्रोन हमला किया उस हमले में मरने वाला एक आतंकवादी केरल का रहने वाला है।
तीसरा समाचार इससे भी अधिक गंभीर है। यह समाचार अमीषा नामक उस लड़की का है जो केरल में मेडिकल की छात्रा रही है। पहले लव जिहाद की शिकार हुई और उसका धर्मान्तरण कराया गया और अब उसे अफगानिस्तान ले जाया गया है, जहां वह अब तालिबान के लिए काम कर रही है। इस लड़की की मां विन्दु संपत ने भारत सरकार से अपनी बेटी का पता लगाने की याचना की है।
हालांकि इस लड़की का मामला पिछले लगभग चार वर्षों से विभिन्न अदालतों में आया है। उसके पिता अपनी बेटी को वापस पाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। इसमें नया यह है कि इस लड़की को अब फिदायीन बनाकर अफगानिस्तान ले जाया गया है। हालांकि इन समाचारों के प्रति सरकार की चुप्पी रही है। न तो इनका समर्थन किया गया और न ही खंडन। लेकिन मीडिया में यहां-वहां लगातार आ रहा है।
हालांकि इन तीनों समाचारों के बाद जितनी गंभीरता भारतीय मीडिया, राजनीति और स्थानीय प्रशासन में आनी चाहिए थी, उसका अभाव ही रहा। कुछ संचार माध्यमों में तो ये समाचार थे ही नहीं और जिनमें आये वे बहुत कम स्थान बना पाये। इसका कारण संभवतः केरल में तीन-तीन वैचारिक शक्तियों की एक युति जैसी बन गयी है। ये तीन शक्तियां हैं वामपंथी विचार, मिशनरी मानसिकता और तालिबानी मानसिकता। केरल में वामपंथी सरकार है और उसे बाकी दोनों विचारकों का समर्थन है। संभवतः इसीलिए सरकार का इन समाचारों के प्रति नरम रुख रहा और इनसे प्रभावित मीडिया का भी।
सामान्यतः वामपंथी स्वयं को धार्मिक कट्टरवाद से अलग होने का दावा करते हैं, लेकिन उनकी यह झलक केवल सनातनियों के मामले में ही दिखती है। शेष के प्रति उनका रुख सदैव समर्थन जैसा ही रहा है। अफगानिस्तान के ताजा घटनाक्रम में चीन का रुख तालिबान के पक्ष में रहा और भारत के तमाम वामपंथी विचारकों ने बाकायदा ऐसी टिप्पणियां की हैं कि तालिबान बदल रहा है। जबकि हकीकत यह है कि मानवता के पक्ष में तालिबान में कोई बदलाव नहीं आया है। वह आज भी आतंकवाद का ही दूसरा पहलू है। जिस प्रकार उसने हत्या करके लाश को हेलीकॉप्टर में लटका कर पूरे काबुल में घुमाया, इससे उसकी मानसिकता स्पष्ट हो जाती है, फिर भी वामपंथी खेमे में चुप्पी है।
यह चुप्पी ठीक वैसी ही है, जैसे सौ साल पहले केरल के मालाबार में हुई क्रूरतम हिंसा के प्रति आंखे मूंदी गयीं थीं। इतिहास में यह हिंसा मोप्ला विद्रोह के नाम से दर्ज है। सबसे बड़ा प्रश्न तो यही कि वह हिंसा मोप्लाओं द्वारा समाज के दमन, सामूहिक हत्याओं, सामूहिक बलात्कार और सामूहिक धर्मांतरण की थी। यह सीधा-सीधा आतंकवाद है, लेकिन इसे विद्रोह लिखा गया। तत्कालीन राजनेताओं में से किसी ने इस पर खुलकर नहीं बोला। वह उस समय के सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बालकृष्ण शिवराम मुंजे ने क्षेत्र की यात्रा की, उन्होंने सरकार को पत्र लिखे, अन्य लोगों का ध्यान खींचा, तब कुछ संगठन वहां पहुंचे और प्रशासन ने कुछ गिरफ्तारियां कीं। सावरकर जी ने इस पर उपन्यास लिखकर देश को जाग्रत किया, फिर भी जिन नगरों में स्त्रियों का हरण हुआ, सामासिक धर्मान्तरण हुआ, उनमें से किसी को राहत न मिल सकी।
आज भी केरल से जिस प्रकार के समाचार आ रहे हैं, उससे स्पष्ट लगता है कि केरल में कुछ नहीं बदला है। सौ साल पहले जो वातावरण था, वह और गहरा हुआ है। तब तो लोग यहीं हिंसा कर रहे थे, लेकिन अब तो यहां के लोग ऐसी हिंसक मानसिकता लेकर दुनिया के दूसरे भागों में भी जा रहे हैं। तालिबान के लिए काम करने वाले 17 लोगों के आंकड़ें आ गए हैं, लेकिन अब भी और कितने लोग ऐसा कर रहे हैं, यह सामने आना बाकी है।
आज इनके नाम भी इसलिए सामने आ पाये कि इनके परिवार वालों को चिंता हुई और उन्होंने आवाज उठाई। उस लड़की का नाम भी तब सामने आया, जब उसके परिवार ने लड़ाई लड़ी। अन्यथा कितने लोग होंगे, कितने परिवार होंगे जो चुप हैं। वह चुप्पी सहमति की भी हो सकती है और भय की भी। लेकिन जिस प्रकार केरल के सामान्य जीवन में असहिष्णुता बढ़ रही है, क्रूरता बढ़ रही है, यह बात पूरे देश के लिए चिंताजनक है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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