Naye Pallav

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आज की नारी की आवाज मुखर करती है ‘सलोनी’

विनोद कुमार विक्की

Saloni book cover
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आज की नारी दोराहे पर खड़ी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। भारत ही नहीं लगभग सभी देशों में प्रारंभ से ही स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही। पुरुषप्रधान समाज ने स्वनिर्मित प्रथा, परंपरा, शारीरक अक्षमता आदि के बहाने उसे कभी अपने समकक्ष खड़े होने का अवसर ही नहीं दिया। यद्यपि स्त्रियों को जब भी अवसर मिला, उन्होंने अपनी उपयोगिता सिद्ध कर बता दिया कि वे पुरुषों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं।
स्त्री मनोविज्ञान पर आधारित नये पल्लव समूह, पटना द्वारा हालिया प्रकाशित ‘सलोनी’ निश्चय ही सराहनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक है, जिसमें कविता, कहानी, लघुकथा, आलेख आदि के माध्यम से स्त्री केंद्रित विषयों यथा- कन्या भ्रूण-हत्या, विधवा पुनर्विवाह, दहेज, लिंगभेद, विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त कुप्रथा, परंपरा, बाल यौन शोषण, वेश्यावृत्ति, एसिड अटैक, फैशन, स्व-रोजगार, परिवार नियोजन, घरेलू एवं कामकाजी महिलाओं की समस्याओं एवं समाधान को यथोचित रूप से उभारने का प्रयास किया गया है।
नए पल्लव समूह के प्रबंध संपादक राजीव मणि जी साहित्य संपादन क्षेत्र में बिलकुल नया नाम है किंतु कम समय में उत्कृष्ट व बेहतर संपादन के कारण अब वे किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उनके अथक प्रयास से स्त्री मनोविज्ञान पर आधारित पुस्तक ‘सलोनी’ के संपादन की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ के नवोदित महिला साहित्यकार दीप्ति रेखा पंडा एवं डाॅ. प्रदीप शर्मा को सौंपी गई। दीप्ति जी के संपादन एवं डाॅ. प्रदीप शर्मा के सह संपादन में स्त्री मनोविज्ञान पर आधारित बेहतरीन रचनाओं का शाहकार है सलोनी’। इस पुस्तक में देशभर के प्रख्यात एवं नवोदित 32 रचनाकारों की रचनाएँ शामिल की गई हैं, जिसके तहत नारी मनोविज्ञान को समझते हुए रचनाओं को शामिल किया गया है।
संपादकीय में युवा संपादक दीप्ति रेखा जब यह लिखती हैं, ‘‘आज इस धरती पर ईश्वर की सर्वोत्तम कृति मनुष्य की जो भी स्थिति है, वह इससे कहीं बेहतर होती, यदि उसके विकास में आधी आबादी अर्थात् स्त्री जाति की संपूर्ण सहभागिता रही होती।…… इस धरती पर कहीं भी कोई सुरक्षित जगह बची नहीं। माँ का गर्भ भी उनके लिए खतरे से खाली नहीं। किसी तरह पैदा हो भी गई, तो इस धरती के गिद्धों के बीच कदम-कदम पर अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष करती स्त्री किसी तरह अपने मुकाम तक पहुँचने की कोशिश कर रही है।’’ तब ऐसा बिलकुल भी नहीं लगता, कि यह उनकी पहली संपादित पुस्तक है।
ज्यों-ज्यों हम ‘सलोनी’ के पन्ने पलटते जाते हैं, त्यों-त्यों हमें पुस्तक की रचनाओं में नारी जीवन की विभिन्न पहलुओं की झलक दिखती जाती है। इस पुस्तक में प्रो. डाॅ. सुधा सिन्हा, डाॅ. शैलेन्द्र सिंह, डाॅ. दीक्षा चैबे, डाॅ. सरला सिंह, पूनम आनंद, रविरश्मि अनुभूति, सपना मिश्रा, शंभूशरण सत्यार्थी, आकांक्षा यादव, सपना मिश्रा जैसे सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के साथ-साथ राहुल प्रसाद, दीपक कुमार, स्निग्धा सिंन्हा रूद्रा, राजकुमार इंद्रेश, कुमारी सरोज बाला, बिनोद कुमार रजक जैसे नवोदित बाल रचनाकारों़ की स्तरीय रचनाओं का संकलन किया गया है।
सिंधु कुमारी ने ‘साहित्य में स्त्री चेतना और विमर्श’ कुसुम संतोष विश्वकर्मा ने ‘विभारानी की कहानियों में चित्रित स्त्री-पृरुष सम्बन्ध’, डाॅ. संगीता पांडेय ने ‘आज के परिदृश्य में नारी’, बिंदु त्रिपाठी ने ‘राजनीति में महिलाएँ’ डाॅ. स्नेहलता ने हिंदी उपन्यासों में घरेलू हिंसा’ तथा डाॅ. चंद्रप्रभा मिश्रा ने ‘आधुनिक नारी की चुनौतियाँ’ शीर्षक आलेख में नारी जीवन की विभिन्न पहलुओं को तर्कपूर्ण ढंग से उभारा गया है। प्रो. डाॅ. सुधा सिन्हा की ‘तीन तलाक: एक गुस्ताख हकीकत’ पाठकों का सोचने पर विवश कर देती है।
नवोदित युवा साहित्यकार राहुल प्रसाद ने ‘नारी एक, रूप अनेक’ शीर्षक की लम्बी कविता में देश के समस्त नारी रत्नों का स्मरण कराया है वहीं डाॅ. कुमारी रश्मि प्रियदर्शिनी ने ‘कौन कहता है कि मैं झांसी की रानी नहीं’ कविता में आधुनिक नारी की असीम क्षमता की हँुकार भर दी है। कृष्णचंद्र महादेविया जी ने अपनी लघुकथाओं के माध्यम से देश के विभिन्न क्षेत्रों में व्याप्त नारी के शोषण सम्बंधी कुप्रथाओं को बहुत ही आकर्षक ढंग से उभारा है वहीं राजू गजभिए की लघुकथाएँ भी पुरुषांे के द्वारा महिलाओं के शोषण को उजागर करती हैं। आकांक्षा यादव की लघुकथाओं में आज की प्रगतिशील नारी के चरित्र को बखूबी उभारा गया है।
डाॅ. प्रदीप शर्मा ने प्रेरक व्यक्तित्व के अंतर्गत रायपुर की नगरमाता बिन्नीबाई सोनकर की दानवीरता का वर्णन बहुत ही आकर्षक ढंग से किया है, जिन्होंने गली-गली घूमते हुए सब्जी बेचकर कमाई हुई अपनी जीवन भर की पूँजी, जो पंद्रह लाख से भी अधिक थी, वह स्कूल और अस्पताल खोलने के लिए दान कर दी। पूनम टांक ने ‘प्रेम के इंद्रधनुषी रंग’ में प्रेम की विस्तृत व्याख्या की है। अरूणिमा सकसेना ने ‘भाभी’ नामक कहानी में विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया है। सपना मिश्रा ने ‘क्या कसूर था‘ कहानी में ‘एसिड अटैक’ और उससे उपजी पीड़ा को बखूबी उभारा है। दीपक कुमार और डाॅ. दीक्षा चैबे की कहानियों में नारी मन के अंतद्र्वन्द्व को बहुत ही खूबसूरत ढंग से प्रस्तुत किया गया है। दिल्ली की प्रख्यात वास्तुविद आशा दिनकर ने जहाँ कई उपयोगी वास्तु टिप्स दिए हैं, वहीं नीतू गुप्ता ने महिलाओं के लिए उपयोगी सौंदर्य टिप्स बताए हैं। कुमारी सरोजबाला जी का आलेख ‘अगर आपकी बेटी का हो ब्वाय फ्रेंड, तो समझदारी से लें काम’ अभिभावकों को नए सिरे से सोचने पर विवश कर देती है।
कुल मिलाकर सलोनी में शामिल तमाम रचनाकारों की उम्दा रचनाएँ पठनीय और संग्रहणीय हंै।
तनय प्रकाशन से प्रकाशित आकर्षक चित्रों से सुसज्जित कुल 160 पेज वाली आई.एस.बी.एन. संख्या प्राप्त सलोनी की कीमत मात्र दो सौ रूपए है।

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