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वीरेंद्र जैन कृत ‘डूब’ उपन्यास में किसान जीवन

डाॅ. स्नेहलता

वीरेंद्र जैन कृत ‘डूब’ उपन्यास किसान जीवन की त्रासदी और उनके कटु अनुभवों से जुड़ा समकालीन उपन्यास है। इस उपन्यास में एक तरफ किसान जीवन की बेबसी को दिखाया गया है, दूसरी तरफ राजनैतिक हथकंडे से ग्रामीण विकास की जगह विनाश का सूक्ष्म चित्रण किया गया है। ‘डूब’ तीन तरफ पहाड़ों से और एक तरफ बेतवा नदी से घिरे लडैइ गाँव की कहानी है, जहाँ सरकार बांध बनवाना चाहती है। बांध बनवाने के नाम पर वे ग्रामीण लोगों को उचित प्रबंध किए बिना विस्थापित करना चाहते हैं। आजादी के बाद से अब तक सत्ता ने ग्रामीण समाज के लिए उतना किया नहीं जितना उनसे छीन लिया है। यही कारण है कि आजादी और विकास के बड़े-बड़े वादों के बाद भी गरीबी रेखा के नीचे जीने वालों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। देश का किसान जिसे लोग अपना अन्नदाता कहते हैं, वो खुद के लिए ढंग से दो वक्त का अन्न नहीं जुटा पा रहा है और आत्महत्या कर रहा है।
भारतीय किसान समस्याओं के दलदल से घिरा हुआ है। बाढ़, अकाल, बेमौसम बारिश, प्राकृतिक आपदाएं, कर्ज, खाद, बीज, अशिक्षा, अंधविश्वास, सरकार की अनदेखी, आदि चीजें किसानों के गले का फंदा बन गई हैं। खेती-किसानी करना किसान के लिए एक जोखिम भरा काम है। खेती करते समय उसे कई चुनौतियों और संघर्षो का सामना करना पड़ता है। चुनौती पूर्ण संघर्ष के बाद अगर फसल की पैदावार अच्छी हो गई, तो बाजार में उसका दाम उसे उसके अनुकूल नहीं मिल पता है। और कभी-कभी तो किसान को अपने लगाये हुए पैसे भी नहीं मिलते और उधर साहूकार आधे से ज्यादा अनाज उठा ले जाता है। “ज्यों ही किसान के घर में अनाज पहुंचता है, उसकी घरवाली उसे अच्छी तरह धो बीन कर रखती है। पसीना सींचकर पैदा किए अनाज के दानों के साथ दुराव करने की वह कल्पना तक नहीं कर सकती। वो यह जानते हुए भी कि इसमें से ज्यादातर अनाज साहूकार ले जाएगा, वह पूरे अनाज को साफ करने का पुण्य कमाने से अपने को वंचित कैसे रखें !” (डूब-पृ. 25) और साहूकार अनाज पर अपना अधिकार जमा लेता है और उसकी किस्मत में शून्य ही रह जाता हैं।
हर एक व्यक्ति को जीवन निर्वाह करने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान चाहिए। ये ही मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं, जिनके बिना व्यक्ति का जिंदा रहना असंभव सा लगता है। विडंबना यह है कि यह मूलभूत जरूरत भी किसानों को जुटाना मुश्किल हो रही है। व्यक्ति की इच्छा-आकांक्षा असीमित है। जितना भी उसे मिले उसके लिए कम है। इसका चित्र हम इस संदर्भ में देख सकते हैं, “आदमी की फितरत ऐसी है कि शरीर की बुनियादी जरूरतें पूरी होते ही मन में तरह-तरह की तरंगे उठने लगती हैं। भौतिक अभाव की दशा में जिंदगी की समस्याएं बहुत सीमित लगती हैं, लेकिन दो जून का खाना, तन ढकने को कपड़ा और सिर के ऊपर छत मिलते ही उनका दायरा बढ़ने लगता है। (डूब-पृ. 80) पर सोंचने वाली बात यह है कि किसान के पास भूख मिटाने के लिए भी पैसे नहीं होते है, तो दूसरी चीजों के बारे में वे क्या सोचेंगे ?

पाप-पुण्य, स्वर्ग-नर्क, विवेकशीलता, नैतिकता, सीधे सरल स्वभाव के कारण किसान का फायदा दूसरे लोग उठाते हैं। अगर फसल ढंग से पैदा न हुई या कम हो गई तो किसान पूजा-पाठ, होम-यज्ञ जैसे अंधविश्वास में चला जाता है। उसे लगता है, यह सब करने से सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसा कभी होता नहीं। “अगर फसल पहले जैसी या उससे भी कम हो तो अपने भाग्य को कोसता हुआ किसान जा पहुंचता है बामन महाराज के चरणों में, ग्रहदशा सुधरवाने।” (डूब-पृ. 25) किसान का अशिक्षित होना और अंधविश्वासी होना उसको और भी गहरे गर्त में ले जाता है और वह अपना शोषण करवाने का जरिया खुद ही चुनता है। इसी स्वर्ग-नर्क और पाप-पुण्य के चक्कर में वह फंस जाता है। ऐसी सोच या विचारधारा से समाज या व्यक्ति को केवल नुकसान ही होगा, फायदा नहीं।
गांव में ज्यादातर यही देखने को मिलता है कि जो अनपढ़ है या जिसके पास कोई दूसरा काम धंधा नहीं है, वैसे लोग ही खेती-बाड़ी कर रहे हैं। यह बात सच है कि वर्तमान में रोजगार का कोई दूसरा साधन मिल जाए तो किसान खेती-बाड़ी बंद कर दे। यह उसकी मजबूरी है कि वह खेती कर रहा है। पढ़े-लिखे या अमीर लोग खेती किसानी से जुड़े हुए नहीं हैं। पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी किसानी करने को खुद का अपमान समझने लगता है। धीरे-धीरे एक ऐसे समाज का गठन किया जा रहा है, जहां पढ़े-लिखे व्यक्ति को नौकरी न मिले तो घर में बेकार बैठा रह जाएगा, परंतु खेती करने में खुद को अपमानित महसूस करेगा। इस संदर्भ को हम उपन्यास में देख सकते हैं। पढ़े-लिखे जनकसिंह के बारे में दद्दू कहते हैं “आठ जमात पास लड़का और खेती-बाड़ी करे ? …शिक्षा का इतना असम्मान भला कौन सह पाएगा ? लोग टोकेंगे नहीं कि ठाकुर, यह क्या अनर्थ करते हो ? आठ जमात तक पढ़े हुए लड़के से खेती-किसानी करवाते हो ?” (डूब-पृ. 51) पढ़े-लिखे युवा वर्ग का इस तरह खेती से मोहभंग और परिवार से पलायन, संयुक्त परिवार का बिखरना, आधुनिक समाज की एक गंभीर समस्या है।
‘गोदान’ उपन्यास के ऊपर टिप्पणी करते हुए मुक्तिबोध ने लिखा था – “इस दौर की सबसे बड़ी घटना है संयुक्त परिवार का टूटना। अभी यह प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई बल्कि और तेज हुई है … ऐसी नौकरी की है कि बूढ़े मां-बाप के लिए समस्या हो गए हैं। इसी तरह होरी का परिवार एक-एक कर टूटता जाता है।” (सं-नामवर सिंह, प्रेमचंद और भारतीय समाज, राजकमल प्रकाशन-2011, पृ. 164)
हालांकि व्यक्ति में अपार शक्ति निहित है। वह चाहे तो कुछ भी कर सकता है। अपनी मेहनत और बुद्धिबल से अनहोनी को होनी कर सकता है। “मनुष्य में अपार शक्ति है। इसीलिए… इसीलिए बेमौसम, बेफसल का गेहूं बोते हैं, वह चाहे तो क्या नहीं कर सकता ! प्रकृति से भी लोहा ले सकता है किसान ! अपनी शक्ति की पहचान का, याद दिलाने का दिन होता है वह !” (डूब-पृ. 117-118) दूसरी तरफ यह भी है कि किसान खेती करना छोड़ देगा तो करेगा क्या ? रोजगार का कोई दूसरा स्थायित्व तो उसके पास है नहीं। वह ज्यादा पढ़ा लिखा भी तो नहीं होता है। जीवन गुजारने के लिए या परिवार पालने के लिए वह खेती करने को मजबूर है।
एक दिन कुछ सरकारी अधिकारी गाँव आकर गाँव वालों को सूचित करते हैं कि सरकार इस गाँव में बहुत बड़ा बांध बनाना चाहती है, जिसके कारण सरकार गाँव के स्कूल और गाँव के लोगों को विस्थापित कराके कहीं और बसाना चाहती है। उपन्यास का मुख्य पात्र ‘माते’ जो गाँव का सर्बमान्य व्यक्ति है, उसे सरकार की यह नीति समझ में नहीं आती। माते सत्ता के चरित्र को पहचानता है, इसीलिए वो कहता है – “कैसा फरेब है ये ? कितना बड़ा झूठ है ये ? कैसी खुशहाली है ये ? कैसा बाँध है ये ? नर बलि लेगा ये ? धरती माता की बलि लेगा ? धोखा है ये ? जो हमें लीलेगा वह औरों को भी लीलेगा। वह फिर किसी को खुशहाल नहीं करेगा। बांध को आदमी का मांस चखा दो तो वह आदमखोर हो जाता है। नरभक्षी हो जाता है वह और बांध को…?” (डूब-पृ. 108)
तिनका-तिनका जोड़कर अथक परिश्रम करके अपना पेट काट-काट कर बनाई गई गृहस्थी को अचानक छोड़ने का सरकारी फरमान किसानों पर वज्रपात के समान होता है। विकास के नाम पर हमेशा से कुर्बानी की बलि ग्रामीण किसानों से ही क्यों ली जाती है। ग्रामीण अपनी जमीन से उजड़ना नहीं चाहते। उन्हें यह सब फरेब लगता है। ग्रामीण जनता जो अंग्रेजी सरकार के जाने के बाद अपनी सरकार के आने से खुश थी, उन्हें इस सूचना ने बहुत चोट पहुँचाई। गाँव के किसान आज़ादी के कुछ सालों बाद ही यह महसूस करने लगे कि केवल राजा और हुकूमत बदल गई, पर सरकारी अत्याचार में कोई कमी नहीं आई। हजारों घरों को बेघर करने का फैसला सरकार चुटकियों में ले लेती है। बिना यह जाने कि अपनी जमीन और जन्मभूमि छोड़ने का क्या दर्द होता है …“ताज्जुब की बात तो यह है कि ये सब तय हुआ कब ? हमसे बिना पूछे हमारी तबाही का फैसला ले लिया, ऐसा तो डाकू भी नहीं करते। वे धन जरूर लूटते हैं, पर घर से बेघर नहीं करते। वे तो अमीरों को सताते हैं। हाँ, उन्हें सताते हैं जो दीनों को सताते हैं, दिन-रात।” (डूब-पृ. 108) इतने बड़े-बड़े जन विरोधी निर्णय बिना जनता को विश्वास में लिए ले लिए जाते हैं। त्याग का सारा बोझ केवल भोले-भाले ग्रामीणों के कंधे पर आता है। पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाने के लिए वर्तमान समय में तो स्थिति और भयावह है। जहाँ सरकार पूंजीपतियों और उनकी निजी कंपनियों को लाभ पहुँचाने के लिए अपने नागरिकों पर गोलियाँ तक चलवा रही है।
सभी देशवासियों की तरह इस गाँव के लोगों को भी लगता था कि अब अंग्रेजों की हुकूमत नहीं प्रजातंत्र है, तो अब खुशहाली आएगी। लेकिन जब प्रजातांत्रिक सत्ता का यह चरित्र देखा तो उन्हें अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म भी कम लगने लगे। गाँव में एक स्कूल था जिसे अंग्रेजों ने बनवाया था, लेकिन प्रजातांत्रिक सरकार बांध बनाने के नाम पर उसे हटवा रही। इस बात से विक्षुब्ध होकर माते कहते हैं – “अब तो अपना राज है, अपनी सरकार है। न कोई राजा है, न प्रजा, तो क्या प्रजा ही प्रजा पर जुल्म ढा रही है ? पर हमरी तो किसी प्रजा से कोई दुश्मनी नहीं है। हमरी तो जो भी बैर-प्रीति है, वो यहीं के लोगों से है। मगर ये सब तो हमरे अपने हैं।” (डूब-पृ. 109)
सत्ता की लोलुपता के चलते नेता हर बार चुनावी भाषणों में किसानों को अपनी बातों में उलझाता है और चुनाव के बाद कुछ देने के बजाय सरकार उनसे ही उनके जल, जंगल, जमीन छीनने में लग जाती है। मुखौटा विकास का होता है और उद्देश्य पूंजीपतियों को लाभ पहुँचाना। उपन्यास का पात्र ‘माते’ सत्ता की ऐसी नीतियों को जानते हुए कहता हैं – “हमसे वोट के सिवा तुमने कुछ चाहा है भला ? हमारी जो दशा बनाई है तुमने, उसमें और देने को है ही क्या हमरे पास ? तुम्हारी दी चीज तो तुम हर पाँच बरस पीछे मांग ही लेते हो। कभी मुँह से हमें खबर भी नहीं देते कि तुमने हमरी चीजें बेची भी है। इसके सिवा तुमने दिया क्या है हमें ? हमसे तो छीना ही है। मदरसा छीना, मोटर छीनी, सड़क छीनी, तेंदू पत्ते का रोजगार छीना, मास्साब छीने, रघु साब छीने, मुसलमान भाई छीने, अट्टू साव छीने, शांति छीनी, मेलजोल छीना।” (डूब-पृ. 58) हमारे पास है क्या ? और तुम्हें देने के लिए।
यह उपन्यास उस समय के परिवेश को प्रकट कर रहा है, जब देश में पूंजीवाद का प्रभाव इतना नहीं था, जितना की आज है। आज जनता और सरकार के बीच दूरी अधिक बढ़ गई है। एक बार वोट पाकर सरकार बनाने के बाद नेता दूसरे चुनाव में ही वापस वोट मांगने आते हैं। बीच के समय में जनता मर रही है या जी रही है, इससे उनका कोई सरोकार नहीं होता। वैसे तो लोकतंत्र सबसे अच्छी और प्रगतिशील शासन प्रणाली है, किंतु राजनेताओं ने लोकतंत्र को इस कदर विकृत कर दिया है कि माते जैसा ग्रामीण किसान राजतंत्र और लोकतंत्र की तुलना इस प्रकार करता है – “पुराने राजा महाराज अपनी प्रजा की खैर-खबर मंत्री संत्री से लेते ही थे, गुप्तचर भी रखते थे ताकि सही बात सही हाल मालूम हो सके। इन गुप्तचरों को सख्त हिदायत होती थी कि वे राजा को सच-सच जस की तस ही बताए भरमाएं नहीं, अंधेरे में न रखे। उन्हें अभयदान मिला होता था राजा की ओर से। तभी वे खरी-खरी कहते थे। बिना लाग लपेट के बताते थे सारे राज का हाल। और कोई-कोई राजा को तो इतने से भी तसल्ली नहीं होती थी। वे तो खुद ही रूप बदलकर निकल जाते थे दूर गाँव-देहात तक, राज्य की सीमा तक। और एक ये है अपनी सरकार ! खबर लेना तो दूर, खुद हमारे दरबज्जे आना तो सपने की बात जैसी है, संकट पर संकट भेजे जा रही है निर्दोष जनता पर।” (वही, पृ-207) राजनीतिज्ञों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को इस कदर भ्रष्ट कर दिया है कि जनता को राजतंत्र की खूबियाँ याद आने लगी है। इतने सालों की आज़ादी और लोकतंत्र में नेताओं ने तो बड़े-बड़े बंगले बना लिये, आलीशान गाड़ियां, चार्टेड प्लेन, लेकिन जिनके वोट से वे सरकार बनाते हैं, वे बदहाली में ही जी रहे हैं।
बांध बनाने के नाम पर सरकार ने गाँव के किसानों की उपजाउ जमीन हथियाली और बदले में किसानों को थोड़ा सा मुआवजा दे दिया। विस्थापन के लिए किसानों को मुआवजे की दर बताई गई है। प्रति बिघा 1600 रुपये, लेकिन किसान पाते है 600 रुपये। बाकी 1000 रुपये देहात के साहूकारों और ब्यूरोक्रेसी की कुटिल चालों में उलझा कर हड़प लिया जाता है। जिस जमीन को किसान अपनी माँ समझते हैं, जिन घरों में उनकी जाने कितनी भावनात्मक यादें जुड़ी होती हैं, उसे सरकार तथाकथित विकास के नाम पर हड़प लेती है। जमीन लेने के पहले सरकार किसानों से बड़े-बड़े वादें करती है। सरकार किसानों का विस्थापन करके कहीं अच्छी जगह पुनर्वास का आश्वासन देती है। उन्हें रोजगार के अवसर देने की बात करती है, मुआवजे की रकम देने की बात करती है। पर व्यवहार में वे प्रतिफलित नहीं होती। सरकार जो कुछ किसानों के लिए भेजती भी है… उसे भ्रष्ट नौकरशाह और भ्रष्ट अधिकारी बीच में ही खा लेते हैं। सच तो यह है कि शासन किसी भी पार्टी का रहा हो, उसने नीतियां केवल पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए ही बनवाई।
आज भी सरकार किसानों से उनकी जमीनों को कौड़ियों के भाव लेकर उन्हें पूंजीपतियों को सौंप रही है, जहां वे बड़ी-बड़ी मिल और फैक्ट्रियाँ खोल रहे हैं। यदि किसान अपनी जमीन छोड़ने से मना करते हैं तो कभी उन्हें विकास विरोधी बताकर या कभी नक्सली बताकर उनपर गोलियां चलवा देती है। आजादी के पहले जो किसानों का शोषण साहूकारों द्वारा होता था, वो अब सरकार द्वारा होने लगा। साहूकार तो गाँव के ही होते थे, इसलिए अपने लोगों के साथ थोड़ी रियायत कर देते थे, किंतु सरकार तो उससे ज्यादा निर्दय है। उपन्यास का पात्र माते इस विडंबना की ओर संकेत करते हुए कहता है – “साब तो चलो हमारा भरण-पोषण करते थे, हमें हर संकट की घड़ी में मदद पहुँचाते थे, कष्ट का निवारण करते थे, दुविधा से उबारते थे, सो दो के पाँच वसूलते रहे। मगर यह सरकार तो बनियों से ज्यादा बेरहम निकली। इसका क्या हक बनता था हमसे कुछ लेने का ? यह तो उलटे हमीं से कुछ खरीद रही थी। फिर हमरी कीमत में इसकी हिस्सेदारी काहे की।” (डूब-पृ. 242)
जब किसानों को मुआवजे की आधी रकम भी नहीं मिलती तो इसी बात को लक्ष्य करके माते क्षुब्ध होकर कहता है – “और जो दाम दिए उसमें से भी आधे झपट लिए ! देने वाली हथेली नीचे रखवाई और मांगने वाली हाथ रखी ऊपर। यह उलटा चलन चलाया, इसीलिए तो न देने वाले के हाथ में कुछ रह पाया न पाने वाले तक कुछ पहुँचा। सब का सब जा गिरा धरती पर, उस गिरे को चाट गए, हजम कर गए घात में बैठे चटोर कुत्ते और सुअर।” (डूब-पृ. 242)
देश में तरक्की तो हो रही है, किंतु तरक्की ऐसी है जिससे दिल्ली, मुंबई, बैंगलौर जैसे शहर तो चमक रहे, लेकिन गाँवों तक में साफ पानी भी नहीं पहुँच रहा है। इसी देश में मुकेश अंबानी एशिया के सबसे अमीर आदमी बनते हैं और इसी देश में एक बेटी अपने किसान पिता के साथ हल में जुतती है। जहाँ एक ओर एक वर्ग ब्रांड कल्चर में जी रहा हैं, बर्गर-पिज्जा खा रहा है, दूसरी ओर एक छोटी बच्ची भूख से भात-भात कहते-कहते मर जाती है। केरल में एक व्यक्ति भूख मिटाने के लिए दो मुट्ठी चावल चुराते हुए पकड़ा जाता है और यही कथाकथित सभ्य समाज उसको पीट-पीट कर मार देता है। शहर और गाँव में जो खाई बढ़ रही है, उसकी ओर संकेत करते हुए माते कहते हैं – “हाँ, इतना जस जरूर सरकार के खाते में जाता है कि जब-जब शहर आता है हमरे पास, कि जब हम जाते हैं शहर के पास, अवस्था चाहे कोई भी हो, हम निहारते रह जाते हैं उजबक की नाई शहर को।”. (डूब-पृ. 251) यह उपन्यास आज के परिवेश में अधिक प्रासंगिक है। नर्मदा बचाओ आंदोलन हो या आदिवासी किसानों का विस्थापन, ये समस्या आज ज्यादा भयावह रूप में हमारे सामने है। माते वैसे तो अशिक्षित है, किंतु वह अनुभव संपन्न एवं राजनीतिक चेतना से लैस पात्र है।

पता ः बालाजी नगर, रोड न. 6. मोहन नगर, कोत्तापेट, हैदराबाद-500035, तेलंगाना

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