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वो गुलाबी चुन्नी

शिखा पांडेय

आज पति और बच्चों को स्कूल भेजकर सोचा अपनी अलमारी सही कर दूं। उफ्फ ! जितने सूट उतनी चुन्नी और एक हमारा जमाना था। मन कब अतीत के साये में चला गया, पता ही न चला। यही कोई आठ या नौ साल की रही हूंगी मैं, जब मुझे चुन्नी का भूत सवार हुआ था। दौड़ कर बाबा के पास गई और बोली, ‘‘बाबा… बाबा ! चुन्नी ला दो।’’
बड़े प्यार से गोद में उठाकर, ‘‘अच्छा मेरी लाडो को चुन्नी चाहिए। कौन से रंग की ?’’
‘‘गुलाबी रंग की बाबा !’’ कहकर मैं खेलने भाग गई। अगले दिन बाबा जब अनाज की गठरी लेकर लौटे, तो बड़े बेमन भाव से बोले, ‘‘लाडो, कल अनाज के सही दाम मिल जायेंगे, तब मैं तुम्हारे लिए गुलाबी चुन्नी लेकर आऊँगा।’’ ये सिलसिला तीन दिन चला और चैथे दिन जाकर बाबा मेरे लिए वो गुलाबी रंग की चुन्नी लाये। आज चुन्नियों से अलमारी भरी पड़ी है, फिर भी वो खुशी नहीं दे पाती, जो खुशी वो गुलाबी रंग की चुन्नी दे गई।

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