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‘आपका प्रेम ही परिभाषा को जन्म दे देगा’

दोस्तों, प्यार को मापा नहीं जा सकता। षब्दों में पिरोया नहीं जा सकता। इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। बंधन में बांधा नहीं जा सकता। यह तो अथाह समुद्र की तरह है। इसे रास्ता देने की जरूरत भी नहीं। इसे रास्ता दिखाने भी नहीं पड़ते। यह तो बिना कहे ही सबकुछ कह जाता है। भाषा कोई अवरोध नहीं बनती।
दरअसल प्रो मटुकनाथ से मैंने अनुरोध किया था कि वे साक्षात्कार के लिए तैयार हों। उन्होंने जवाब में प्रेम-रस में मुझे जो नहलाया, मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। साथ ही, उन्होंने वादा किया है कि वे हर सप्ताह प्रेम से जुड़े सवालों का जवाब देंगे। यह पहली किस्त है। विष्वास है पाठकों को पसंद आयेगा।

लवगुरु, प्यार क्या है ? आप इसे कैसे परिभाषित करेंगे? प्यार के लिए समाज में कैसे जगह बन सकती है ?

मित्रवर ! प्यार की परिभाषा न ही पूछें तो अच्छा! परिभाषा बुरी शिक्षा की देन है। विद्यार्थियों को परिभाषा में उलझा कर उसके स्वाद से वंचित रखने का यह खतरनाक षड्यंत्र है। पुस्तकें प्रेम की परिभाषाओं से पटी पड़ी हैं, पर समाज में प्रेम नहीं है। प्रेम की परिभाषा है, प्रेम नहीं है। पुस्तकों में प्रजातंत्र की परिभाषाएँ हैं, देश में सच्चा प्रजातंत्र नहीं है। शिक्षा की परिभाषाएँ हैं, लेकिन देश में सच्ची शिक्षा नहीं है। देश के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि कैसे उनके जीवन में प्रेम की रसधार बहे, कैसे देश को मुट्ठी भर स्वार्थी वर्चस्वधारी शोषकों-शासकों से मुक्ति दिलायी जाय, कैसे ऐसी शिक्षा प्रणाली लायी जाय, जिसमें ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की परिभाषा साकार हो !
कोल्हू के बैल की तरह जिस लीक पर युवाओं को गोल-गोल घुमाया जा रहा है, जहाँ गति ही गति है, प्रगति कहीं नहीं है, उस लीक से मैं उन्हें बाहर खींचना चाहूँगा। आप प्रेम की परिभाषा नहीं खोजें, प्रेम खोजें। रसगुल्ले की परिभाषा की माँग न करें, रसगुल्ले का जुगाड़ करें। रसगुल्ले की परिभाषा से कहीं उसका स्वाद जाना जाता है? वह तो मुँह में डालने पर ही जाना जा सकेगा। मेरा जोर स्वाद पर है, परिभाषा पर कतई नहीं। प्रेम का स्वाद चखते ही आदमी का रूपांतरण हो जाता है। साधारण लोक से वह असाधारण लोक में प्रवेश कर जाता है जहाँ सुख और दुख की किस्में अलग हैं और जो हर हालत में प्राप्त करने योग्य हैं। प्रेम की परिभाषा जानने से आदमी के भीतर कोई बदलाव नहीं आता, कोई सुख नहीं उतरता।
समाज में प्यार की बयार बहाने के लिए एक प्रयोग मैंने करना चाहा था। जब मैं 2009 में संसदीय चुनाव लड़ने के लिए पटना साहिब से खड़ा हुआ था, तो अपने घोषणा पत्र में कई महत्वपूर्ण मुद्दों के साथ एक ‘लवर्स पार्क’ बनाने का इरादा व्यक्त किया था, लेकिन सत्ताधारियों को जनता का यह स्वर्ग पसंद नहीं था और उन्होंने जबरन अपनी ताकत का सहारा लेकर मेरा नामांकन रद्द करवा दिया। नामांकन रद्द करना उनके वश मंे था, मेरे सपनों को रद्द करना किसी के वश में नहीं है, वह अभी भी पल रहा है। अब तो ऐसे सक्षम साथियों का सहारा मिलने जा रहा है जिसमें यह सपना साकार होकर रहेगा। कम से कम एक हजार एकड़ भूमि में एक ऐसा ‘प्रेमपुरम’ बनेगा जिसमें दस हजार प्रेमी एक साथ एक प्रेम परिवार की तरह रहेंगे, जहाँ धरती पर प्रेम का स्वर्ग उतारने के लिए दिव्य प्रयोग होंगे।
प्रेम तो मनुष्य का स्वभाव है, वह तो अपने आप उत्पन्न होता है, सिर्फ उसके मार्ग की बाधाओं को हटाना पड़ता है। सबसे बड़ी बाधा है वह पुराना संस्कार जो अज्ञानतावश प्रेम से भयभीत है। इस जबर्दस्त संस्कार ने असमय ही युवाओं को बूढ़ा बना दिया है। भले ही उसका शरीर जवान हो, उसकी आत्मा बूढ़ी हो गयी है। जवान शरीर में जब बूढ़ी आत्मा को देखता हूँ, तो सर धुनता हूँ। हां, विधाता, इस युवा को किस पाप का दंड दे रहे हो! ‘प्रेमपुरम’ के आप भी भागीदार बनंे और इसकी स्थापना के लिए देश के किसी भी हिस्से में एक हजार एकड़ जमीन ढ़़ूँढ़ें और मिल जाय तो खबर करें। उस जमीन पर प्रेम का स्वर्ग उतारा जायेगा जिसकी रोशनी दुनिया के कोने-कोने में फैलेगी। वहाँ प्रेम से जीने का स्वाद मिलना शुरू होगा। यह स्वाद ही प्यार को समाज में स्थान दिलाने में सहारा बनेगा।
कुछ साल पहले मीडिया ने जोर शोर से प्रचारित किया था कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ी है। दरअसल मैंने कोई परिभाषा नहीं गढ़ी, सिर्फ प्रेम को जीने का दुस्साहस किया। यह साहस जरूर नया था। प्रेम के लिए सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। तन-मन-धन-प्रतिष्ठा दाँव पर रखने में जो अनूठापन था, वह नया था। संभवतः इसी के आधार पर कहा गया कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा दी। और जब नया कहा गया, तो लोगों में उत्सुकता जगी – जानूँ, क्या नया है भाई! मीडिया के प्रचार के कारण ही चारों तरफ मुझसे प्रेम की परिभाषा पूछी जाने लगी। हकीकत है कि मैं प्रेम की परिभाषा जानता ही नहीं – ‘दिल-विल प्यार-व्यार, मैं क्या जानूँ रे, जानूँ तो जानू बस इतना कि मैं तुझे अपना जानू रे’। दूसरा जब अपना हो जाय, दूसरा दूसरा न रह जाय, तो प्यार है। प्यार दूरी पाट देता है, दो को मिलाकर एक कर देता है। यह प्यार पूरा विकास पाये तो पूरी दुनिया एक हो जाती है। ऋषि ने जब कहा – सोऽहम् – अर्थात् मैं वही हूँ, तो यह प्यार का ही उद्घोष है। जो तुम हो, वही मैं हूँ। जो मैं हूँ, वही तुम हो, इसका बोध ही प्यार है। इसी अवस्था में धरती से शोषण और भ्रष्टाचार पूर्णतः हट सकता है, अन्यथा नहीं।
लेकिन आपने प्रेम की परिभाषा पूछी है तो उसका एक अन्य कारण समझ में आ रहा है। प्रेम की परिभाषा जानने के पीछे संभवतः एक कारण यह हो सकता है कि प्रेमी आश्वस्त होना चाहते हैं कि जो वे अनुभव कर रहे हैं किसी स्त्री के साथ, वह क्या है – महज आकर्षण है? वासना है? मोह है? आसक्ति है? प्रेम है? क्या है? कैसे मैं समझूँ कि मुझे प्यार हो गया। अगर ऐसा भाव उठे तो इसे मन की जल्पना समझ कर ज्यादा तरजीह न दें। सिर्फ प्रेम में डूबें। प्रेम जब प्रथम-प्रथम जगता है, तो वह आकर्षण ही होता है, मोह या आसक्ति से गुजरते हुए अगर सही ढंग से आदमी यात्रा करे, तो उसका प्रेम निर्मल हो सकता है। अपने प्रेम को जाँचने के लिए प्रेम की परिभाषा जानना जरूरी नहीं है। सिर्फ एक कसौटी मैं दे रहा हूँ। अगर आपका प्यार दुख ले आये तो समझिये गलत है, अगर उत्तरोत्तर आनंद में बढ़ोतरी होती जाय तो सही है। हर कर्म की कसौटी आनंद ही है।
प्रेम की परिभाषा जानने से प्रेम नहीं निकलता, परन्तु प्रेम जानने से परिभाषा जरूर निकलती है। आप प्रेम शुरू करें। आपका प्रेम ही परिभाषा को जन्म दे देगा। दूसरों के द्वारा दी गयी प्रेम की परिभाषा के चक्कर में न पड़ें।

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