महा शिवरात्रि
रीना कुमारी

तू महाकाल, तू ही मृत्युंजय।
तू परम वैरागी, तू ही प्रचंड प्रेमी।।
काम जिसके चरणों में; योग जिसके हृदय में,
सृजन और संहार, एक साथ बसते तेरे कर में।।
तू देवों, दानवों, मानवों और गंधर्वाें में,
भूत-प्रेतो, गणों, किन्नरो और निशाचरो में।।
हे पशुपति नाथ, तू मूक पशुओं के करुण स्वर में।।
कालकूट हलक में, विषधर कंधों पर,
हे आशुतोष, चंद्रमा सुशोभित तेरे मस्तक में।।
तू स्त्री-पुरुष की समता में,
अर्धनारीश्वर, तू विराज रहा स्त्री की संप्रभुता में।।
धनिकों के कन काभ शिखरों में,
दीनों की विपन्न कुटिया में,
तू शमशान में विचरता, औघड़ों की मस्ती में।।
एक लोटे जल से प्रसन्न होने वाले,
हे महादेव, तू हमेशा विराजे मेरे हृदय में।।
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