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राजीव मणि की बाल कविताएं

नदी
चोट खाती, पर्वत से गिरकर,
बहती है नदी
कुछ रूठी, कुछ सहमी सी
अलग रास्ता बनाती है नदी।
चल देती है अनंत की ओर
कठिनाइयों का सामना करते
चट्टानों से टकराती हुई।।

एक सच्चे साधु की तरह
सहनषील होती है वह।
कभी पर्वतों का चरण स्पर्ष करती
तो कभी चट्टानों के सिर से होकर
वनों की ओर
दौर लगाती है नदी।
अंततः थक और हार कर
बदल देती है वह
अपना पथ, अपना रास्ता
और मिल जाती है पुनः
समुद्र से जाकर।
अर्थात् वह षून्य से
षून्य की ओर चलती है
और फिर षून्य में
समा जाती है, नदी।

शून्य
जन्म से पहले
हम षून्य में थे
जन्म लिए षून्य में आए
लड़कपन गया
जवानी आई
पर षून्य नहीं गया
कुछ देखा, कुछ सुना
पर षून्य में ही रहकर
षून्य को समझ नहीं पाए
षून्य में ही पढ़े
काम किए
कठिनाइयों का सामना किए
और कठिनाइयों से लड़ते
हम बूढ़े हो गए
षून्य में मरकर
हम षून्य को चले गए
हमारी यात्र्ाा षून्य से चलकर
षून्य को समाप्त हो गई
यह कोई छोटा षून्य नहीं
यह है एक विषाल षून्य
और इस षून्य की आत्मा है
हमारे प्रभु, हमारे ईष्वर।

बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से

पढ़ना-लिखना बेटा मन से
स्वस्थ रहो सदा तुम तन से
कितने दिनों पहले पढ़ने
भेजी थी मैं चाव से
बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से।

पापा तेरे चिन्तित रहते
कैसे-कैसे दुख वे सहते
भाई-बहन तेरे सब कहते
कब लौटेगा तू पढ़ लिखके
हम सबों के आस लगे हैं
तेरे बढ़ते पांव से
बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से।
दुनिया बदली, मौसम बदला
रोगों के लक्षण सब बदले
पढ़ना-लिखना मन लगा के
और बचना धूप-छांव से
बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से।
षिक्षक तेरे षुभचिन्तक हैं
छात्र्ा तेरे हैं भाई-बहन
महान लोग जाने जाते
अपने अच्छे काम से
तुम भी ऐसा काम करो
जाने जाओ खुदके पहचान से
जब छुट्टी होगी तो मैं
आऊंगी नाव से
बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से।

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