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आज मन फिर उदास है

कविता

ज्योति कठायत

शायद फिर मन की चाबी ने
यादों की अलमारी को खोला है
शायद फिर सपनों के तराजू ने
हकीकत की सच्चाई तोला है
उन यादों की अलमारी में कुछ तो खास है
इसलिए मेरा मन शायद आज फिर उदास है।

शायद मेरे कल का जहान
मेरे आज से ज्यादा अच्छा था
शायद मेरा भोला बचपन
मेरे बड़प्पन से ज्यादा सच्चा था
शायद मेरे मन में बीते कल के
वापस आने की झूठी आश है
इसलिए मेरा मन शायद आज फिर उदास है।

शायद बीते कल का कोई राही
आज मुझे आवाज लगाता है
और शायद मेरे पास आते ही
वो मेरी पहचान भूल जाता है
पर उसकी उस आवाज में
एक सच्चा विश्वास है
इसलिए मेरा मन शायद आज फिर उदास है।

शायद मेरे सपनों की दीवार
मेरी हकीकत से ज्यादा बड़ी है
शायद मेरी यादें मेरे दिल पर
पहरा डाले खड़ी हैं
शायद मुझे लगता है कि
गुजरा हुआ मुसाफिर अब भी मेरे पास है
इसलिए मेरा मन शायद आज फिर उदास है।

लोग क्या कहेंगे ?

रात में घर को जाने में, मैं घबराया करती हूं
जी लू जिंदगी चाहे जितना, मन ही मन में मरती हूं
ये सोच कर कि लोग क्या कहेंगे ?

‘कहां गई थी, किसके साथ, क्यों गई थी ?
दोस्त था या कोई और ?’
फिक्र की झूठी चादर में लिपटे
ये कड़वे शब्द
तीर की तरह मेरे मन में चुभ जाते हैं
और लोग कहते हैं कि
समय बड़े-बड़े जख्मों को भर देता है
तो जिंदगी भर क्यों ये शब्द मुझे दर्द पहुंचाते हैं ?
अब पिंजरे का पंछी बनकर पिंजरे में ही मरती हूं
ये सोच कर कि लोग क्या कहेंगे ?

‘कितने छोटे कपड़े पहने हैं, इसमें तनिक भी लज्जा नहीं है
संस्कार नाम की चीज नहीं है इसमें।’
कपड़ों से छोटी ये सोच तुम्हारी
मेरे मन में कचरा भरती है।
मेरी सोच तुम्हारे आगे झुककर
खुद को कपड़ों से आंका करती है
खुद की सोच पे पर्दा डाले छोटे कपड़ों में डरती है
कि लोग क्या कहेंगे ?

अब ना घबराना किसी और से
ना ही मन में मरना है
अब ना सड़ना है पिंजरे में
और ना कपड़ों से डरना है
क्यों लोगों की बातें सुनकर
अपना वक्त बर्बाद करें
जिये जिंदगी जी भर के बिना ये परवाह किए
कि लोग क्या कहेंगे ?

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